विवादों का पर्याय बन चुके संत आसाराम बापू का जन्म 17 अप्रैल सन् 1941 को दिन में 12 बजे पाकिस्तान के सिंध प्रांत में नवाब शाह जिले के बैरानी गांव में हुआ। इनके जन्म के समय पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र 'शिव' योग एवं 'चक्रसुदर्शन' मुहूर्त चल रहा था, क्षितिज पर मिथुन लग्न का उदय भी हो चुका था।
मिथुन लग्न की कुंडली में लग्न से चतुर्थ भाव में राहू, सप्तम में चंद्रमा, अष्टम में मंगल और दशम भाव में नीचराशि के बुध बैठे हैं, जबकि एकादश लाभ भाव में सूर्य, गुरु, शुक्र एवं शनि बैठे हैं।
कुंडली में शुभ-अशुभ मिलाकर सौ से ज्यादा योग बने हैं किन्तु सबसे प्रमुख योगों में चतुर्ग्रही योग, कुशल वक्ता और धर्मगुरु की ख्याति वाले योग प्रमुख हैं। चतुर्थ भाव राहू और दशम भाव में बुध के साथ केतु होने के फलस्वरुप इनका बाल्यकाल काफी अभाव और घोर संघर्षों में बीता और पिता से वियोग भी हुआ।
इनके जीवन में सबसे बड़ा परिवर्तन वाणीभाव के स्वामी (द्वितीयेश) चंद्रमा की महादशा, बृहस्पति की अंतर्दशा जून 1963 से अक्टूबर 1964 में आया। जब इनके गुरु लीलाशाह ने संत आसाराम का नाम दिया। चंद्रमा और बृहस्पति के नव-पंचम संयोग ने आसाराम को संतश्री बना दिया।
उस समय इनकी उम्र 23 साल की थी, तब से आजतक कामयाबियों की सीढ़ियां चढ़ते जा रहे हैं। विवादों से घिरे रहने के योग ने उन्हें भक्तों की आस्था-विश्वास का लाभ लेते हुए जोधपुर की जेल तक का सफर तय कर लिए।
राम राम! इन बाबाओं ने किए बुरे काम!
वर्तमान समय में इन पर जुलाई 2011 से नीच राशि गत शनि की महादशा चल रही है उसमे भी शनि की ही अंतर्दशा जुलाई 2014 तक चलेगी यह समय इनके लिए कदापि अनुकूल नही है।
शनि वर्तमान ''पराभव'' नाम के संवत्सर के भी मंत्री हैं इसलिए इनके लिए ये संकेत अच्छे नहीं हैं अगस्त 2013 से फ़रवरी 2014 तक इनपर राहू का प्रत्यंतर चल रहा है। इसलिए अभी संतश्री की परेशानियां इन्हें अकेला नहीं छोडेंगी बल्कि भरपूर तंग करेंगी।