'विज्ञान की सरहद जहां खत्म होती है, ज्योतिष वहां से शुरू होता है'
ज्योतिषाचार्य समीर उपाध्याय ने कहा कि ज्योति और शास्त्र मिलकर बना है ज्योतिष। यानी प्रकाश दिखाने वाला शास्त्र। जब ग्रहण आता था तो जीव-जंतु अलग तरह का व्यवहार करते थे। हमारे ऋषि-मुनियों ने जब इस पर अनुसंधान किया, तब ज्योतिष का ज्ञान प्राप्त हुआ। ज्योतिष की चर्चा ऋगवेद के समय से हो रही है। जीवन की योजना बनाने में एक कारक ज्योतिष बनता है। नौ ग्रहों को तीन समूहों में विभाजित किया जाता है। जब कुंडली बनती है, तब आपके जीवन की महत्वपूर्ण बातें तय हो जाती हैं। पूर्व जन्मों का प्रारब्ध (पूर्व जन्म के कर्मों का फल) इस जन्म के सत्कर्मों से ही ठीक हो पाता है।
ज्योतिषी-खगोलशास्त्री वराह मिहिर के बनाए सिद्धांत को सौ फीसदी सही माना जाता है, लेकिन लोगों ने एक समय उनके फलित विज्ञान को सिरे से नकार दिया था। शास्त्र अपनी जगह पर एकदम ठीक थे। शास्त्रों को मानने वालों की संख्या घटती चली गई। जहां विज्ञान की सरहद खत्म होती है, ज्योतिष वहां से शुरू होता है। ज्योतिष धोखेबाजों का धंधा नहीं है। यह प्रतिष्ठित हुनर है। जीवन को बेहतर तरीके से जीने की पद्धति में ज्योतिष मदद करता है। ज्योतिष में अंधविश्वास की कोई जगह नहीं है। वैदिक काल में एक समय ऐसा आया, जब कर्मकांड का प्रभाव बहुत बढ़ गया। फिर अंधविश्वास शुरू हुआ।
'पहले राजा-महाराज नक्षत्रों की गणना देखते थे'
नाड़ी और नक्षत्र विशेषज्ञ डॉ. संजीव कुमार श्रीवास्तव ने कहा कि ज्योतिष एक तरह से जीवन का जीपीएस है। इतिहास में बहुत से ऐसे राज हैं, जो अब तक पूरी तरह सामने नहीं आ पाए हैं। पहले राजा-महाराजाओं को नक्षत्रों की गणना से पता चल जाता था कि कब युद्ध होने के आसार हैं और कब अकाल पड़ने वाला हैं। आजकल हम ग्रहों और राशियों पर ही ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन नक्षत्रों पर ध्यान नहीं देते। 27 नक्षत्र हैं। जब इन्हें भी देखा जाता है तो भविष्य बताना और सटीक हो जाता है। हर धर्म में ज्योतिष शास्त्र को लेकर सम्मान का भाव रहता है। ज्योतिष अंधविश्वास नहीं है, विशुद्ध विज्ञान है। जहां तक काल सर्प दोष, मांगलिक दोष और पितृ दोष की बात है तो इस पर मंथन करने और अनुसंधान करने की जरूरत है। सिर्फ एक दोष होने से आपकी किस्मत नहीं बदल जाती, और भी बहुत से कारण होते हैं।
'ज्योतिष को व्याप्त है, श्वास है'
ज्योतिषाचार्य आचार्य आनंद ने कहा कि ज्योतिष वेदों का अंग है। ज्योतिष वेदों का नेत्र है। तिथिर्वारश्च नक्षत्र योगः करण मेव च यानी ज्योतिष पांच अंगों को मिलकर बना है- तिथि, वार, नक्षत्र, योग और करण। ज्योतिष को आगे बढ़ने की जरूरत नहीं है। ज्योतिष तो व्याप्त है। यह श्वास की तरह है। इसे प्रचार-प्रसार की आवश्यकता नहीं है। ज्योतिष तो सनातन है। ऋगवेद में ज्योतिष के बारे में स्पष्ट तौर पर लिखा है कि यह ज्योतिष विद्या 83 हजार वर्ष पुरानी है।
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