शास्त्र कहते हैं कि, 'न क्षयः इति अक्षयः' अर्थात जिसका क्षय नहीं होता वह अक्षय है। वर्ष में चैत्र माह के शुक्लपक्ष की नवमी (रामनवमी), वैशाख शुक्लपक्ष की तृतीया, (अक्षय तृतीया) आश्विन माह शुक्लपक्ष की दशमी (विजय दशमी) और कार्तिक माह शुक्लपक्ष की एकादशी इन्हें स्वयं सिद्ध या अक्षय मुहूर्त के नाम से जाना जाता है। इनमें भी वैशाख माह की तृतीया को सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस दिन रोहिणी नक्षत्र और बुधवार का दिन भी हो तो यह और भी अमोघफल देने वाली हो जाती है। यदि संयोगवश बुधवार न हो तो बुध की होरा को भी ग्रहण किया जा सकता है।
मुहूर्त ज्योतिष के अनुसार तिथियों का घटना-बढ़ना, क्षय होना आदि चन्द्रमास एवं सौरमास के अनुसार निश्चित होता रहता है, किन्तु 'अक्षय' तृतीया का कभी भी क्षय नहीं होता। वर्तमान श्रीश्वेतवाराहकल्प के मध्य चल रहे वैवस्वत मन्वन्तर में सतयुग के आरम्भ की इस अक्षुण फलदायी तिथि को मानव कल्याण हेतु माता पार्वती ने बनाया था। वे कहती हैं कि जो स्त्री/पुरुष सब प्रकार का सुख चाहते हैं उन्हें 'अक्षय' तृतीया का व्रत करना चाहिए। इस तृतीया के व्रत के दिन नमक नहीं खाना चाहिए।
व्रत की महिमा को बताते हुए माँ पार्वती कहती हैं, कि यही व्रत करके मैं प्रत्येक जन्म में भगवान शिव के साथ आनंदित रहती हूं। उत्तम पति की प्राप्ति के लिए भी हर कुँवारी कन्याओं को यह व्रत करना चाहिए। जिनको संतान की प्राप्ति नहीं हो रही हो वे भी यह व्रत करके संतान सुख ले सकती हैं। देवी इंद्राणी ने यही व्रत करके 'जयंत' नामक पुत्र प्राप्त किया था। देवी अरुंधती यही व्रत करके अपने पति महर्षि वशिष्ट के साथ आकाश में सबसे ऊपर का स्थान प्राप्त कर सकी थीं। प्रजापति दक्ष की पुत्री रोहिणी ने यही व्रत करके अपने पति चन्द्र की सबसे प्रिय रहीं। उन्होंने बिना नमक खाए यह व्रत किया था। सभी प्राणियों को इस दिन झूट बोलने और पाप करने से दूर रहना चाहिए। जो प्राणी किसी भी तरह का यज्ञ, जप-तप, दान-पुण्य करता है उसके द्वारा किये गये सत्कर्म का फल अक्षुण रहेगा। भूमि पूजन, व्यापार आरम्भ, गृहप्रवेश, वैवाहिक कार्य, यज्ञोपवीत संस्कार, नए अनुबंध पर हस्ताक्षर तथा नामकरण आदि जैसे सभी मांगलिक कार्यों के लिए अक्षय तृतीया वरदान की तरह है।
इस दिन सूर्योदय काल के समय रोहिणी नक्षत्र भी विद्यमान रहेगा इसलिए यह और भी शुभफलदायक दिन रहेगा। प्राणियों को इस दिन भगवान विष्णु की लक्ष्मी सहित गंध, चन्दन, अक्षत, पुष्प, धुप, दीप नैवैद्य आदि से पूजा करनी चाहिए। अगर भगवान विष्णु को गंगाजल और अक्षत से स्नान करावै, तो मनुष्य राजसूय यज्ञ के फल कि प्राप्ति होती है। शास्त्रों में इस दिन वृक्षारोपण का भी अमोघ फल बताया गया है जिस प्रकार अक्षय तृतीया को लगाये गये वृक्ष हरे-भरे होकर पल्लवित पुष्पित होते हैं उसी प्रकार इस दिन वृक्षारोपण करने वाला प्राणी भी कामयाबियों के चरम पर पहुंचता है।