सभी दैनिक मुहूर्तों में महानतम रविपुष्य योग 11 अक्टूबर, रविवार को है। सभी कार्यों में सिद्धि प्रदान करने वाला ये योग इस दिन सूर्योदय से आरम्भ होकर रात्रि 01 बजकर 17 मिनट तक रहेगा। ज्योतिष शास्त्र में सभी 27 नक्षत्रों में 'पुष्य' नक्षत्र को सर्वश्रेष्ठ माना गया है, यद्यपि अभिजीत मुहूर्त को नारायण के 'चक्रसुदर्शन' के समान शक्तिशाली बताया गया है फिर भी पुष्य नक्षत्र और इससे बनने वाले शुभ मुहूर्त का प्रभाव अन्य मुहूर्तो की तुलना में सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यह नक्षत्र सभी अरिष्टों का नाशक और सर्व दिग्गामी है।
विवाह को छोड़कर अन्य कोई भी कार्य जैसे अनुबंध पर हस्ताक्षर करना हो, मकान-वाहन क्रय करना हो, व्यापार आदि आरम्भ करना हो, नौकरी पर जाना हो अथवा किसी भी तरह का कार्य आरम्भ करना हो उसे पुष्य नक्षत्र और इनके द्वारा बनने वाले श्रेष्ठ मुहूर्तों में किया जा सकता है। इस नक्षत्र का सर्वाधिक महत्व बृहस्पतिवार और रविवार को होता है क्योंकि, बृहस्पतिवार को यह नक्षत्र विद्यमान हो तो गुरुपुष्य, और रविवार को हो रविपुष्य योग बनता है, जो मुहूर्त ज्योतिष के श्रेष्ठतम मुहूर्तों में से एक है।
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इस नक्षत्र को तिष्य कहा गया है जिसका अर्थ होता है श्रेष्ठ एवं मंगलकारी। बृहस्पति भी इसी नक्षत्र में पैदा हुए थे। तैत्रीय ब्राह्मण में कहा गया है कि, बृहस्पतिं प्रथमं जायमानः तिष्यं नक्षत्रं अभिसं बभूव। नारदपुराण के अनुसार इस नक्षत्र में जन्मा जातक महान कर्म करने वाला, बलवान, कृपालु, धार्मिक, धनी, विविध कलाओं का ज्ञाता, दयालु और सत्यवादी होता है। आरंभ काल से ही इस नक्षत्र में किये गये सभी कर्म शुभफल दाई कहे गये हैं किन्तु, माँ पार्वती के विवाह के समय शिव से मिले श्राप के परिणामस्वरुप पाणिग्रहण संस्कार के लिए इस नक्षत्र को वर्जित माना गया है।
इस योग में धर्म, कर्म, मंत्रजाप, अनुष्ठान, मंत्र दीक्षा अनुबंध, व्यापार आदि आरंभ करने के लिए अतिशुभ माना गया है सृष्टि के अन्य सभी शुभकार्य भी इस नक्षत्र में आरंभ किये जा सकते हैं क्योंकि अपनी उपस्थिति में रविपुष्य योग लाखों दोषों का शमन कर देता है अतः इस योग में सभी कर्म किये जा सकते हैं। नारी जगत के लिए ये नक्षत्र और भी विशेष प्रभावशाली माना गया है। इनमें जन्मी कन्याएं अपने कुल-खानदान का यश चारों दिशाओं में फैलाती हैं और कई महिलाओं को तो महान तपश्विनी की संज्ञा मिली है जैसा कि कहा भी गया है कि- देवधर्म धनैर्युक्तः पुत्रयुक्तो विचक्षणः। पुष्ये च जायते लोकः शांतात्मा शुभगः सुखी। अर्थात- जिस कन्या की उत्पत्ति पुष्य नक्षत्र में होती है वह शौभाग्य शालिनी, धर्म में रूचि रखने वाली, धन-धान्य एवं पुत्रों से युक्त सौन्दर्य शालिनी तथा पतिव्रता होती है।
वैसे तो यह नक्षत्र हर सत्ताईसवें दिन आता है किन्तु हर बार गुरुवार या रविवार ही हो ये तो संभव नही हैं इसलिए इस नक्षत्र के दिन गुरु एवं सूर्य की होरा में भी कार्य आरंभ करके गुरुपुष्य और रविपुष्य जैसा परिणाम प्राप्त किया जा सकता हैं।