जिले की प्राकृतिक छटा पर डांका, लगातार गायब हो रहे पेड़
कालोनी बसाने को सुंदरीकरण में उपयोग करते हैं खजूर के पेड़
पिछले दिनों डीएएफओ ने पकड़ा पूरा ट्रक तो मामला आया प्रकाश में
बदायूं। जिले का ऐतिहासिक महत्व है। यहां के रेतीले स्थानों पर जहां दूर-दूर तक खजूर जैसा दुर्लभ पेड़ों के झुंड के झुंड दिखाई देते थे, वहां अब वैसी प्राकृतिक छटा नहीं रह गई है। हाल ही में खुलासा हुआ है कि महानगरों के बिल्डर्स और कॉलोननाइजर्स जिले से खजूर के पेड़ों को जड़ से उखाड़कर ले जा रहे हैं। यह खेल लंबे समय से चल रहा है। पता लगा है कि बिल्डर्स और कॉलोनाइजर्स इन पेड़ों को नई कालोनी बसाने में उनके सुंदरीकरण को इसका प्लांटेशन कर उपयोग कर रहे हैं। बिल्डर्स की इस निहायत स्वार्थ लिप्सा ने जिले के प्राकृतिक छटा पर डांका डाला है। अगर, इसे नहीं रोका गया तो निकट भविष्य में जिले से खजूर के पेड़ ही गायब हो जाएंगे।
खजूर का पेड़ रेतीले स्थानों पर होता है। कक्षा एक में पहले ख से खजूर पढ़ाया जाता रहा है। इससे ही इसकी लोकप्रियता का पता लगता है। यही नहीं ये अपने आकार प्रकार के अलग होने के कारण आकर्षण का केंद्र होते हैं। यही वजह है कि टैंटेज व्यवस्था में पलास्टिक के बने खजूर के पेंडों को लाइटों से जगमग कर लगाया जाता है, जिससे टैंटेज व्यवस्था में चार चांद लग जाते हैं। शायद यही वजह है कि महानगरों के बिल्डर्स और कॉलोनाइजर्स को नई कालोनी निर्माण में सुंदरीकरण को इनका प्लांटेशन कराया जा रहा है।
अफसोस जनक बात तो यह है कि बदायूं में जहां-जहां खजूर के पेंड़ों की तादाद अधिक थी, उन जगहों पर इन बिल्डर्स की नजरें पड़ गई हैं। धीरे-धीरे, लंबे समय से वे खजूर के पेंडों को जड़ से उखाड़ कर ले जा रहे हैं और यहां प्राकृतिक सुंदरता के प्रतिरूप खजूर के इन पेड़ों को सफाया होता जा रहा है। लोगों का मानना है कि यही हालात रहे तो सहसवान में केवड़ा की भांति जिले से खजूर की प्रजाति भी लुप्त हो जाएगी।
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अपनी कई खासियतें रखता है खजूर
यहां राजकीय महाविद्यालय के वनस्पति विज्ञान के प्रोफेसर डॉ. इकबाल हबीब ने बताया कि खजूर का पेड़ वैसे तो हिंदुस्तान में कई स्थानों पर पाया जाता है, बदायूं में भी इस प्रजाति के पेड़ों की संख्या खासी है। रेतीले इलाके में इनके पेड़ होते हैं। इसकी आयु करीब 200 वर्ष होती है लेकिन इनकी बढ़वार बहुत धीमी होती है। इसे पानी की अधिक आवश्यकता नहीं होती है। एक साल में यह आधा मीटर भी नहीं बढ़ पाता है। अपने आकार प्रकार में और पेड़ों से अलग होता है। इसलिए आकर्षण का केंद्र होता है। इसकी जड़ों में बाल्व होते हैं। शायद इसीलिए इनको जड़ से उखाड़कर लोग प्लांटेशन को ले जा रहे हैं।
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डीएएफओ ने पकड़ा ट्रक तो खुला राज
पिछले दिनों बिसौली क्षेत्र में खजूर के जड़ से खुदे पेड़ों को डीएफओ एके कश्यप ने पकड़ा। उन्होंने रवन्ना न होने पर इस पर जुर्माना डाला है। पूछताछ में उन्हें पता लगा है कि बिल्डर्स इसे बाहर ले जाते हैं और इनका कालोनी की सुंदरीकरण में इस्तेमाल कर रहे हैं। पकड़ा गया ट्रक यहां से खजूर के पेड़ नोएडा ले जा रहा था। इस पेड़ पर रवन्ना का प्रतिबंध है। इसलिए इन पेंड़ों से भरे ट्रक पर डीएफओ को कार्रवाई करनी पड़ी।
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पहले पटेला बनाने के काम आते थे खजूर
किसान मोहनलाल और सूरज सिंह ने बताया कि जिले में शेखूपुर, सहसवान समेत विभिन्न रेतीले इलाके में खजूर के पेड़ों की तादाद लगातार घट रही है। पहले लोग इस पेड़ को बीच से चीकर पटेला बनाने का काम लेते थे। जुताई के बाद खेत का समतलीकरण इसी से किया जाता था।
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वर्जन-
खजूर पर रवन्ना प्रावधान है। जब यह पता लगा है कि खजूर को कॉलोनाइजर्स और बिल्डर्स यहां से ले जा रहे हैं तो इसकी निगरानी तेज कर दी गई है। जिले से प्राकृतिक छटा के इन पेड़ों को नष्ट होने से बचाने के लिए पूरे प्रयास करेंगे।
-एक कश्यप, डीएफओ, बदायूं।