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सांप्रदायिक एकता के अलमबरदार मौलाना आजाद

Rampur

Updated Sun, 12 Aug 2012 12:00 PM IST
रामपुर। एक ऐसा व्यक्ति जो अरबी, फारसी, उर्दू, अंग्रेजी, हिंदी और बंगला सहित अन्य भाषाओं का ज्ञाता था। जिसे दर्शनशास्त्र, गणित और इतिहास की बारीक समझ थी। जो हिंदू-मुसलिम एकता का कट्टर समर्थक था। जिसने ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बिहार, बंगाल और महाराष्ट्र में गुप्त क्रांतिकारी गतिविधियां चलाईं। मुसलिम युवकों को स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ा। जिसका सपना एक ऐसा एकीकृत राष्ट्र का था जहां हिंदू-मुसलमान आपसी भाईचारे के साथ तरक्की के रास्ते पर बढ़ सके।
कुछ ऐसे थे रामपुर के पहले सांसद और देश के पहले शिक्षामंत्री भारत रत्न मौलाना अबुल कलाम आजाद। एक महान स्वतंत्रता सेनानी, निर्भीक पत्रकार, शिक्षाविद् और सांप्रदायिक सौहार्द के प्रणेता। मौलाना आजाद ने खिलाफत आंदोलन, असहयोग आंदोलन, भारत छोड़ो आंदोलन सहित कई आंदोलनों में सक्रिय रूप से भाग लिया। इस दौरान उनको कई बार जेल की यात्रा भी करनी पड़ी। खिलाफत आंदोलन के दौरान मौलाना अली ब्रदर्स (शौकत अली और मोेहम्मद अली जौहर) के नजदीक आए। अली ब्रदर्स से उनके दोस्ताना ताल्लुक था। असहयोग आंदोलन के दौरान राष्ट्रवादी नेताओं में मतभेद पैदा हुआ तो मौलाना आजाद ने महात्मा गांधी का साथ दिया।
मौलाना आजाद हमेशा से हिंदू-मुसलिम एकता के समर्थक रहे। एक पत्रकार के रूप में उन्होंने अल हिलाल और अल बलाग के माध्यम से सांप्रदायिक एकता की अलख जगाई। मौलाना आजाद का मानना था कि हिंदुस्तान की समस्या आर्थिक है, सांप्रदायिक नहीं। सबसे कम उम्र में इंडियन नेशनल कांग्रेस के प्रेसिडेंट बनने वाले मौलाना आजाद ने अपने भाषण में कहा था कि अगर हिंदुस्तान आजाद नहीं होता है तो इसका नुकसान सिर्फ हिंदुस्तान को होगा। अगर हिंदू-मुसलमान बंट गए तो पूरी मानवता का नुकसान होगा।
मौलाना आजाद की कोशिश हमेशा सबको साथ लेकर चलने की रही। 1935 में उन्होंने मोहम्मद अली जिन्ना और कांग्रेस के बीच बातचीत की वकालत की थी। इसी तरह से 1938 में जब नेताजी सुभाषचंद्र बोस और गांधी जी के समर्थकों के बीच मतभेद की स्थिति सामने आई तो मौलाना आजाद ने बीच का रास्ता निकलाने की कोशिश की। मुल्क के बंटवारे की बात चलने के बाद दौरान हिंसा का बढ़ने लगी तो मौलाना कई इलाकों में जाकर हिंदू-मुसलमानों के बीच कमजोर पड़ते रिश्तों को मजबूत बनाने की कोशिश की। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद मौलाना आजाद को देश के प्रथम शिक्षा मंत्री की जिम्मेदारी सौंपी गई। 1951 में जब देश में लोकसभा के पहले चुनाव हुए तो मौलाना रामपुर से सांसद निर्वाचित हुए। रामपुर का सांसद देश का पहला शिक्षा मंत्री बना। एक ऐसा शिक्षा मंत्री जिसने आईआईटी और यूजीसी की स्थापना कराई। मौलाना ने शिक्षा मंत्री के रूप में ऐसी शिक्षा प्रणाली का सपना देखा था जहां बुनियादी तालीम मुफ्त हो और बेहतर उच्च शिक्षा की व्यवस्था हो।
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