सलोनी प्रकरण के बाद भी शिशु सदन की नहीं ली सुध

Rampur Updated Wed, 25 Jul 2012 12:00 PM IST
रामपुर। राजकीय शिशु सदन, जहां बेसहारा मासूमों को सहारा दिया जाता है, लेकिन खुद ही सदन बेसहारा होकर रह गया है। यह स्थिति तब है जब मासूम सलोनी मौत के आगोश में सो चुकी है। तीन मासूम अस्पताल में भरती होकर वापस लौट चुके है। हालत यह है कि न तो यहां अधीक्षक है और न ही बच्चों की देखभाल के लिए नर्स और आया। चंद कर्मियों के भरोसे 38 बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी टिकी है।
बेसहारा बच्चों के लिए बरसों पहले महिला कल्याण विभाग की ओर से राजकीय शिशु सदन खोला गया था। अभी तक किराए के भवनों में चलने वाले सदन पर नजर दौड़ाई जाए तो यहां की हालत बदतर होती जा रही है। राजकीय शिशु सदन को दो हिस्सों में बांटा गया है। जीरो से छह वर्ष तक के बच्चों के लिए दत्तक ग्रहण इकाई देखभाल करती है, जबकि छह से दस वर्ष तक के बच्चों की देखभाल राजकीय शिशु सदन के हवाले है। सदन में कुल 38 बच्चे हैं। मगर, यहां की व्यवस्था पर सरकारी लापरवाही उजागर हो रही है। यहां की तीन साल की मासूम सलोनी की बीमारी के बाद हुई मौत और उठे तूफान के बाद भी यहां की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है। नगर विकास मंत्री आजम खां और महिला कल्याण मंत्री अरुण कोरी ने सदन का निरीक्षण कर लापरवाही की बात को स्वीकारा भी। सलोनी की मौत की गाज सहायक अधीक्षक डा.किशुंक त्रिपाठी और नर्स पर पहले ही गिर चुकी है। बच्चों की जिम्मेदारी महज चार आया के पर है। नियम है कि दस बच्चों पर चार आया होना चाहिए, यहां तो 38 बच्चों पर ही चार आया की जिम्मेदारी है।

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