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विकास केनाम पर विनाश आ रहा निकट

Rampur Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
रामपुर। विकास की छलांग लगाते हुए धरती के विनाश केलिए बड़े-बड़े गड्ढे खोदे जा रहे हैं। धरती का पारिस्थतिकी तंत्र और खाद्य श्रृखला बिगड़ गई है। कभी इमारतें बनाने को तो कभी बड़े-बड़े मार्ग के नाम पर हमेशा पर्यावरण की ही बली दी जा रही है। कभी वनों से ढके रामपुर क्षेत्र में दो ही स्थानों पर जंगल रह गए हैं। वे भी संरक्षित होने की वजह से बचे हुए हैं।

करीब चार दशक पूर्व रामपुर की धरती पर तेंदुआ हिरन का शिकार करता था। उसकी दहाड़ से जंगल गूंजा करता था। अब उसकी दहाड़ इस क्षेत्र में लुप्त होने केसाथ गायब हो गई है। मांसाहारी वन्य पशुओं के गायब होते ही क्षेत्र में शाकाहारी वन्य पशुओं का आंतक बढ़ गया। पर्यावरण जनकल्याण समिति केअध्यक्ष प्रेमपाल सैनी ने बताया कि जिले में 6610 हेक्टेयर आरक्षित वन क्षेत्र है। इसमें करीब 4 हजार पीपली में है। उन्होंने बताया कि देश की आजादी केवक्त रामपुर क्षेत्र का करीब तीस फीसदी हिस्सा जंगल से ढका था। अब यह घटकर एक चौथाई रह गया है। वन विभाग से प्राप्त जानकारी केअनुसार आरक्षित वन क्षेत्र के2028.8 हेक्टेयर जमीन पर कुछ किसान अपना दावा कर रहे हैं। इसे लेकर वन विभाग को कुछ क्षेत्रीय लोगों से कोर्ट में मामला भी चल रहा है।

सैनी ने बताया कि जनपद में पारिस्थितिकी व खाद्य श्रृंखला बिगड़ गया है। वन कम होने से मांसाहारी वन्य पशु यहां से चले गए हैं। इसकी वजह से शाकाहारी वन्य पशुओं की संख्या में बढ़ोतरी होने से खेती को नुकसान बढ़ गया है। इसके अलावा जंगल बाढ़ और आंधी-तूफान की तेजी पर अंकुश लगाते हैं। जंगल कटने से सीओटू की मात्रा लगातार बढ़ रही है और ऑक्सीजन कम हो रही है। पर्यावरण में आई तब्दीली से एक दशक पूर्व घर केआंगन में चहकती गौरेया भी नजर आनी बंद हो गई है।

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