जल पर्यटन से मिल सकता है रोजगार

Hamirpur Updated Sat, 14 Jul 2012 12:00 PM IST
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हमीरपुर। अंग्रेजी हुकूमत में परगना रहा जलालपुर व्यापारिक केंद्र हुआ करता था। यहां से कोलकाता तक होने वाला व्यापार नदियों के जरिए होता था। 1857 की गदर के दौरान जलालपुर उजड़ गया। अब वक्त की मार से सूखती और सिकुड़ती यमुना और बेतवा नदियां आज भी जल पर्यटन के जरिए बुंदेली बेरोजगारों को रोजगार देने को बेकरार हैं। इससे न केवल रोजगार के अवसर मिलेंगे अपितु नदियों की दशा और बिना खर्च सोशल आडिट भी हो सकेगा। भविष्य में इन्हें संरक्षित कर बचाए रखने के लिए मील का पत्थर साबित होगा।
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1857 की गदर (क्रांति) के दौरान हमीरपुर के तत्कालीन परगना जलालपुर से कोलकाता तक जलमार्ग के जरिए गेहूं, चना, दालों और अन्य सामान का व्यापार हुआ करता था। गजटियर के मुताबिक तब 3500 हजार के आसपास इस परगना की आबादी थी। अंग्रेजों द्वारा गदर को कुचलने के बाद यहां से व्यापारी पलायन कर गए। नजीता यहां मात्र दो हजार के आसपास ही लोग बचे। आज बुंदेलखंड के लोग बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं। भोपाल ताल से निकली बेतवा और हिमालय से निकली यमुना में आज भी इतना पानी है कि वह यहां के सैकड़ों लोगों को जल पर्यटन के जरिए रोजगार के अवसर दे सकें। नदियों के तटों पर पड़ने वाले प्रमुख गांवों, मजरों, कसबों और शहरों में एतिहासिक महत्व से जुड़े मंदिर, मस्जिद, भवनों, मजारों और इमारतों के विषय में पर्यटकों को जानकारी होने से नदियों में जलविहार, नौकायन व मोटर वोटों के माध्यम से जिले की पहचान बन सकता है।
सन् 1994-95 में तत्कालीन जिलाधिकारी अरुण आर्या ने सड़कों के किनारे सैकड़ों स्टील बोर्ड के जरिए हमीरपुर व महोबा के प्रमुख ऐतिहासिक स्थलों की जानकारी दिलाने का प्रयास किया था। इन बोर्ड के जरिए लोगों ने गौरवशाली इतिहास के बारे में जाना जो अब गायब हैं। मात्र उनके आधार ही नजर आते है। यमुना व बेतवा से न केवल पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा अपितु बेरोजगारों को रोजगार के साथ-साथ लाइफ लाइन कही जाने वाली अच्छी व बुरी गतिविधियां मिलेंगी। पर्यटन से एक बार फिर आम जनता में नदियों में बहाए जाने वाले कचरे को बंद करने की सोच पैदा होगी।
डब्लूडब्लूएफ (भारत) बुंदेलखंड में 1990 के दशक में अपनी सेवाएं दे चुके जलीस खान का मानना है कि बड़े शहरों व वातानुकूलित कमरों पर बैठकर योजनाएं बनाई जाती हैं। जबकि धरातल से जुड़े विकास की बात पर ध्यान नहीं दिया गया तो विकास के नाम पर विनाश ही होगा। सरकारी योजना में हमेशा चंद लोगों को लाभ देकर इतिश्री कर दी जाती है। कहा कि वक्त की नजाकत को समझकर अब यमुना बेतवा को बचाने के लिए जनसहभागिता आधारित जल पर्यटन को बढ़ावा सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए
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