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डीए बैन की समीक्षा की मांग को और लोग सामने आए

Bhadohi Updated Thu, 30 Aug 2012 12:00 PM IST
डीए बैन की समीक्षा की मांग को और लोग सामने आए
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भदोही। केंद्रीय वस्त्र मंत्रालय द्वारा कुछ शर्तों के साथ उधारी कालीन निर्यात पर प्रतिबंध लगाए अभी दो महीने ही बीते हैं कि इसमें खामियां गिनाई जाने लगी हैं। कल अखिल भारतीय कालीन निर्माता संघ (एकमा) के पूर्व अध्यक्ष हाजी शौकत अली अंसारी द्वारा बैन के साथ थोपे गए शर्तों पर सवाल खड़ा करने के बाद बुधवार को काफी लोग इसकी हिमायत करने लगे हैं। एकमा के पूर्व मानद सचिव और पूर्व संयुक्त सचिव ने भी यही सवाल खड़ा करते हुए एकमा और सीईपीसी को मिल कर दोबारा मुहिम छोड़ने की बात की।
हाजी अब्दुल हादी अंसारी ने कहा कि डीए पर बैन का मसौदा मझोले निर्यातकों को बचाने के लिए बनाया गया था लेकिन जिस प्रकार से इसमें ईसीजीसी को थोपा गया है उससे तो छोटे निर्यातक ही मारे जाएंगे। उन्होंने कहा कि वर्ष 1994 में जो बैन लगा था उसमें साफ था कि डीए एक्सपोर्ट बैन अनलेस बैंक गारंटी। उन्होंने इस मुहिम तो एकमा और सीईपीसी को मिल कर छेड़ने का आह्वान किया। एकमा के ही पूर्व संयुक्त सचिव रहे हाजी अशफाक अंसारी ने कहा कि जब इस मसौदे को एकमा में प्रस्तुत किया जा रहा था तो मैंने लोगों को आगाह किया था लेकिन तब किसी ने एक न सुनी थी। उन्होंने कहा कि बहुत से लोग तो ऐसे हैं जिनका माल तैयार है और उन्हें ईसीजीसी कवर देने को तैयार नहीं है। उन्होंने कहा कि कंपलीट बैन के लिए फिर से मुहिम छेड़ी जाए।
नगर के प्रमुख कालीन निर्यातक, अब्दुल कादिर अंसारी ने भी इस बात को कहा कि बैन मतलब बैन, आंशिक बैन लगाने और ईसीजीसी की भूमिका को बढ़ा देने का अर्थ है छोटे और मझोले निर्यातकों का उद्योग से छंटनी जो मजदूरों के लिए घातक होगा। गोपीगंज के प्रमुख और युवा निर्यातक, संजय गुप्ता ने कहा कि जिस दिन डीए पर बैन की बात कही गई थी उसी दिन इसका आभास हो गया था कि ऐसी दशा होने वाली है मुश्किल इस बात की है लोग न चाहते हुए भी इस आधे अधूरे बैन को स्वीकार कर गए जिसका खामियाजा अब भुगतना पड़ रहा है।

परिस्थितियां गिना कर नकारात्मक बता रहे हैं लोग
भदोही। कालीन उद्योग में डीए पर बैन का मामला इसलिए उठा था कि जब आयातक कहीं उधार माल नहीं पाएगा तो बैंक गारंटी पर किसी न किसी से माल खरीदेगा ही। लंबे प्रयासों के बाद इस पर बैन लगा जरूर लेकिन कुछ शर्तों के साथ। शर्तों में ईसीजीसी की भूमिका अचानक बढ़ जाना भी लोगों को रास नहीं आ रहा है। बकौल निर्यातक ईसीजीसी का महत्व बढ़ने से पिछले दो महीनों में क्या क्या समस्याएं आई हैं उन पर एक नजर।
उदाहरण एक-किसी निर्यातक का डीए पर बिजनेस ठीक ठाक चल रहा है। नई परिस्थिति में उसे माल भेजने के लिए ईसीजीसी कवर लेना होगा। मतलब प्रिमियम पर एक प्रतिशत खर्च बढ़ गया और यदि किसी परिस्थिति में भुगतान फंस भी गया तो वह ईसीजीसी देगा या नहीं, कब देगा? बड़ा सवाल खड़ा हो जाता है।
उदाहरण दो- कोई मझोला निर्यातक ईसीजीसी के पास किसी बायर को 25 लाख का माल भेजने के लिए कवर मांगने जाता है। संयोग से ईसीजीसी के पास उक्त बायर की क्रेडिट का कवर पहले ही किसी को दे चुकी होती है तो फिर किसी निर्यातक को नया कवर नहीं मिलेगा और ना ही निर्यातक माल भेज सकेगा।
उदाहरण तीन- एक निर्यातक ने किसी आयातक को 50 लाख का माल भेजने के लिए ईसीजीसी कवर खरीदा। और उक्त माल की तैयारी मेें लग गया। इस बीच ईसीजीसी को प्रतीत होता है कि उक्त बायर की साख (क्रेडिट) एकाएक गिर गई है तो उस परिस्थिति में क्या होगा? तैयार हो रहा 50 लाख का माल फिर कौन खरीदेगा?
नगर में ऐसेे कई निर्यातक हैं जिन्होंने अलग अलग परिस्थितियों का हवाला देते हुए डीए बैन की वर्तमान स्वरूप को नकारात्मक बताया है। लोगों का कहना है कि यह मझोले और मध्यम दर्जे के निर्यातकों को तो खा जाएगा। हालांकि इसमें अभी लोग अपना नाम देने से इंकार कर रहे हैं।

इसीजीसी कवर पर बरकरार है भ्रम
भदोही। उधारी कालीन निर्यात पर प्रतिबंध की अधिसूचना 1 जुलाई से लागू हुई है। इसमें ईसीजीसी का महत्व बढ़ने के बाद सभी को उम्मीद थी कि ईसीजीसी लोगों के साथ सेमिनार अथवा कार्यशाला कर इसीजीसी कवर के प्रिमियन, कवर खरीदने, भुगतान फंसने की स्थिति में क्या होगा?
जैसे तमाम भ्रांतियों पर लोगों को न केवल जानकारी देगी बल्कि स्थिति भी साफ करेगी लेकिन इन दो महीनों में न तो ईसीजीसी ने ऐसा कोई कार्यक्रम किया ना ही एकमा ने इस बारे में कोई पहल की। यही कारण है कि डीए बैन को लागू करने तथा ईसीजीसी कवर खरीदने में लोगों भारी समस्याएं हो रही हैं। कई निर्यातकों ने कहा कि ईसीजीसी कवर खरीदने के लिए आवश्यक कायदे कानून क्या हैं उन्हें इसकी जानकारी तक नहीं है।

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