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नफ्स की ख्वाहिशों को गर्क कर देना है रोजा

Bhadohi

Updated Sat, 28 Jul 2012 12:00 PM IST
ज्ञानपुर। रोजा मुसलमानों के लिए बातिनी इबादत है और यह हर मुसलमान पर फर्ज है। खुदा के लिए अपने नफ्स (इंद्रियों) की ख्वाहिशों यानी चाहतों को गर्क कर देना ही रोजा है। रोजा रख कर इबादत करने से आखिरत में भी राहत मिलती है। ये बातें ज्ञानपुर जामा मस्जिद के इमाम मौलाना नजीर आलम ने शुक्रवार को जुमे की नमाज से पहले अपनी तकरीर में कही।
उन्होंने कहा कि माहे रमजान में ही खुदा-ए-पाक ने कुरआन सहित तीन अन्य आसमानी किताबें जमीन पर नाजिल की। मौलाना ने कहा कि रोजेदार की दुआ कभी खाली नहीं जाती। इफ्तार से पहले रोजेदार कोई भी जायज दुआ करता है तो उसे खुदा-ए-पाक जरूर कबूल फरमाता है। कहा कि इस माहे मुकद्दस में मुसलमानों को शैतान से डर नहीं रह जाता है। उन्होंने कहा कि इंसान के साथ मरने के बाद इबादत ही एक ऐसी चीज है, जो साथ जाती है। अजाबे कब्र नाजिल होने से पहले ही ये पांचों बंदे का बचाव करेंगे। कहा कि तीन लोगों की दुआएं खुदा के पास सबसे पहले पहुंचती हैं। सबसे पहले रोजेदार का, दूसरा बादशाह का और तीसरा मजलूम का।
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