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त्रेतायुग का साक्षी है सीता समाहित स्थल सीतामढ़ी

Bhadohi Updated Sun, 24 Jun 2012 12:00 PM IST
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सीतामढ़ी। महर्षि वाल्मीकि की तपोस्थली, माता सीता के निर्वासन काल की आश्रय स्थली, भगवान श्रीराम के सुपुत्रों लव और कुश की जन्मस्थली और सीता समाहित स्थल के गौरव बोध से दीप्त जनपद का पौराणिक और धार्मिकस्थल सीतामढ़ी त्रेता युग का साक्षी है। यहां के कण-कण में माता सीता मढ़ी हुई हैं। इस स्थल की प्रमाणिकता संत शिरोमणि गोस्वामी तुलसीदास जी ने अपनी कवितावली के पद्यों के माध्यम से किया है-जहां वाल्मीकि भयो व्याध से मुनींद्र। साधु, सिय को निवास लव-कुश को जनम थलु। वारीपुर-दिगपुर बीच बिलसति भूमि। इसकी पुष्टि संत बेनी माधव जी ने गोसाईं चरित्रावली में की है। दिगपुर-बारीपुर बीच सीतामढ़ी। वर्तमान में भी सीतामढ़ी के पूरब बारीपुर और पश्चिम दिशा में दिगपुर (डीघ) गांव मौजूद है। इस पावन स्थली की महत्ता का बखान करें तो यह वह स्थली है, जहां ब्रह्मा की कृपा रूपी प्रेरणा से महर्षि वाल्मीकि ने आदि काव्य रूप रामायण की रचना की थी। यहां की धरती पर महर्षि वाल्मीकि आश्रम में सभी माताओं की वंदनीय आदर्श रूप सीताजी के सतीत्व के रक्षार्थ द्वितीय वनवास के निर्वासन काल की आश्रय स्थली है। जहां महर्षि के सानिध्य में लव-कुश कुमारों की शिक्षा-दीक्षा हुई और श्रीराम के अश्वमेध यज्ञ के घोड़े को पकड़कर बांधने के बाद उनकी चतुरंगिनी सेना को परास्त किया।
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सीतामढ़ी का सीता समाहित स्थल मंदिर माता सीता के धरती में प्रवेश का बोध कराता है। जब सीता जी और श्रीराम के अंतिम मिलन पर सत्य रूपी सतीत्व के रक्षार्थ श्रीराम के आदेश पर महर्षि वाल्मीकि के द्वारा शुद्धता की प्रमाणिकता देने पर भी माता सीता स्वयं शुद्धता रूपी सतीत्व की प्रमाणिकता के लिए पृथ्वी मां की गोद में सदा के लिए समा गईं। मान्यता है कि जब सीताजी धरती की गोद में जाने लगीं तो श्रीराम जी ने उनका केश पकड़ लिया, जो आज भी सीता समाहित मंदिर के आसपास विद्यमान है। इसे सीता केश के रूप में जाना जाता है। महिलाएं श्रद्धाभाव से सीताकेश का दर्शन पूजन कर शृंगार करती हैं। इससे उन्हें मनोवांछित फल की प्राप्ति होती है। खासकर श्रावण मास में महिलाएं सीता केश का विशेष पूजन अर्चन और शृंगार कर अपने अखंड सुहाग की कामना करती हैं। वर्तमान में सीता समाहित स्थल का भव्य सीता मंदिर, विश्व प्रसिद्ध 108 फुट ऊंचे हनुमान जी की मूर्ति श्रद्धालुओं और सैलानियों के प्रमुख आकर्षण का केंद्र है।
इनसेट
उडि़या बाबा के आश्रम में उमड़ती है भीड़
125 वर्षीय संत उडि़या बाबा गंगा तट पर स्थित आश्रम में श्रद्धालुओं को नैतिकता का पाठ पढ़ाते रहते हैं। प्राचीन सीता मंदिर और महर्षि वाल्मीकि आश्रम ऐतिहासिक स्थलों में एक है। भव्य और विशाल मंदिर निर्माण (सीताधाम) कार्य में लगे दीनबंधु दीनानाथ मौनी बाबा लोगों में आस्था और विश्वास के लिए जाने जाते हैं। तो सीतावट, सीता केश, पतित पावनी गंगा ऐसी जीवंत धरोहर हैं जो युगों-युगों तक लोगों को लाभान्वित करती रहेंगी। सबके रक्षार्थ 108 फिर ऊंचे पवन सुत आस्था और विश्वास के प्रतीक हैं।

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