प्यास बढ़ाते रहे तो धरती कैसे उगलेगी सोना

Badaun Updated Tue, 06 May 2014 05:31 AM IST
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उझानी (बदायूं)। अत्यधिक जल दोहन खतरनाक है। यह जानता तो हर कोई है लेकिन न जाने क्यों हम उसी मोड़ पर पहुंचते जा रहे हैं जहां से खतरे के अलावा कुछ और नजर नहीं आता। जानते तो यह भी हैं कि अत्यधिक जल दोहन वाली फसलों में खासकर मेंथा ने अन्नदाता को नुकसान पहुंचाया है। मेंथा की रफ्तार नहीं थमी तो धरती की प्यास बढ़ेगी और आने वाले वक्त में वह सोना उगलने लायक भी नहीं बचेगी।
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अत्यधिक जलदोहन वाली फसलों में यूं तो धान और ईख के अलावा गर्मी के दिनों में बोई जाने वाली मक्का की अगेती फसल और साठा धान भी शामिल है लेकिन पिछले डेढ़-दो दशक में जिस तेजी से किसानों ने मेंथा की ओर कदम बढ़ाया, वह बड़ी तेजी से वाटर लेबल को कम कर रहा है। मेंथा को अमूमन 15 से 20 बार सिंचाई चाहिए। सिंचाई के मौजूदा संसाधनों पर गौर करें तो जिले में कोई नहर नहीं है। भैंसोर का वजूद मिट चुका है तो सोत अपना वजूद के लिए जद्दोजहद कर रही है। रही बात धान की तो प्रति किलो धान पर करीब तीन हजार लीटर पानी खर्च होता है।
गन्ने की फसल भले ही 10 या 11 महीने में तैयार हो जाती है लेकिन उसे बरसात के बलबूते तैयार नहीं किया जा सकता। मक्का की अगेती फसल चैत्र और बैसाख के दिनों की है, सो निजी संसाधनों से सिंचाई करके उसमें हरियाली तो बनाए रख सकते हैं लेकिन वाटर लेबल किस कदर नीचे खिसकेगा, इसका आंकलन करें तो अन्नदाता भी सिहर उठेगा। फिलहाल दिक्कत तो है लेकिन आने वाले एक दशक में फसलों का खेल ही खराब हो जाएगा। कृषि वैज्ञानिकों के एक आंकड़े पर गौर करें तो अत्यधिक जलदोहन से एक दिन मेंथा की महक ही उड़ जाएगी। कम सिंचाई वाली फसलों से औसत पैदावार लेने तक के लाले पड़ जाएंगे।
तिलहन-दलहन पर करें गौर
कम सिंचाई वाली फसलों में तिलहन में सरसों और लाही तो दलहन में उडद, मूंग, मसूर समेत मटर की पैदावार की ओर अन्नदाता को एक बार फिर से गौर करना होगा। बाजरा भी फायदेमंद साबित हो सकता है। मक्का और गन्ना भी अगेती न बोएं। कम सिंचाई वाली फसलों से वाटर लेबल में सुधार के साथ लंबे समय तक हालात को काबू में रखा जा सकता है।

किसानों की भी सुनिए
मेंथा से बचके रहना होगा
वरामालदेव निवासी पूर्व प्रधान गिरीशपाल सिंह कहते हैं कि अत्यधिक सिंचाई वाली फसलों में मैथा अब अधिक धन अर्जित करने वाली फसल नहीं रही। एक समय था जब मैथा ने उत्पादकों के बारे-न्यारे कर दिए थे लेकिन अब ऐसा नजर नहीं आता।

किसानों को बदलनी होगी सोच
इलाके के प्रगतिशील किसानों में शामिल बुर्राफरीदपुर के संतराम यादव ने बताया कि ढर्रे वाली खेती को ज्यादा समय तक नहीं किया जा सकता। वैज्ञानिक तरीके के अनुरूप खेती करके जल संकट से भी बचा जा सकता है। किसानों को भी सोच बदलनी होगी।

अत्यधिक जलदोहन से बचें
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कादरचौक क्षेत्र के गांव बमनौसी निवासी काश्तकार रघुराज सिंह की मानें तो कटरी क्षेत्र में मुख्य फसल गन्ना की होती है लेकिन गंगा किनारे के गांवों में भी वाटर लेबल तेजी से गिर रहा है। यह सबसे बड़ी चिंता का विषय है। इस चिंता को कम करने के लिए अत्यधिक जलदोहन से बचना होगा।
वर्जन
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जिले के जो ब्लॉक क्षेत्र डार्क जोन में हैं, उनमें वाटर लेवल बढ़ाने के लिए किसानों को अत्यधिक जलदोहन वाली फसलों से मुंह मोड़ लेना चाहिए। ऐसा भी नहीं कि अन्य क्षेत्र में कोई दिक्कत नहीं, दिक्कत तो तब होगी जब काश्तकार सच्चाई पर गौर नहीं करेंगे।- डॉ. अर्जुन सिंह, कृषि वैज्ञानिक
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