चुनाव में गए वर्दी वाले, अब तो भगवान ही रखवाले

Badaun Updated Mon, 05 May 2014 05:31 AM IST
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बदायूं। लोकसभा चुनाव के दौरान जिले का लॉ-एंड-आर्डर बार-बार बिगड़ रहा है तो उसकी बड़ी वजह पुलिस वालों की कमी भी है। अन्य जिलों में चुनाव निपटाने को फोर्स गया है तो अपने जिले में तमाम व्यवहारिक दिक्कतें आ गई हैं। थानों की वीरानगी, चौकियों की तालाबंदी देखकर इसे आसानी से समझा जा सकता है।
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जिले में चुनाव कराने के तीन दिन बाद ही यहां से करीब सात सौ पुलिसकर्मियों का स्टाफ अन्य जिलों में चुनाव कराने रवाना हो गया था। इनमें करीब 650 सामान्य पुलिसकर्मी हैं तो बाकी दरोगा, एचसीपी और अन्य संवर्ग का स्टाफ है। लोकसभा चुनाव के दो चरण अभी शेष बचे हैं। ऐसे में तेरह मई से पहले इस स्टाफ के वापस ड्यूटी पर लौटने का सवाल नहीं उठता। यह वापस आएंगे भी तो मतगणना के रिहर्सल और मतगणना में इनकी ड्यूटी लगा दी जाएगी। इस लिहाज से सत्रह मई से पहले जिले को पुलिस की दृष्टि से समद्ध कर पाना संभव नहीं है। पुलिस स्टाफ की तगड़ी कमी से सामान्य कार्यों के अलावा तमाम विशिष्ट कार्य तक अटके पड़े हैं। सबसे बड़ी समस्या गश्त प्रभावित होना है। अधिकांश चीता बाइक पुलिसकर्मियों के आवासों पर खड़ी हैं। इनके पेट्रोल टैंक भी सूखने लगे हैं। पुलिस के मूवमेंट में कमी का असर सरेआम हो रहीं राहजनी और हत्याओं से साफ देखा जा सकता है। कई थानों में प्रभारी के अलावा ड्राइवर, एकाध दरोगा और मुंशी ही शेष बचे हैं। ऐसे में थाना प्रभारी बस वक्त ऊपरवाले के रहमोकरम पर वक्त काटते दिख रहे हैं। दबी जुबान से कई थानेदार इस सच्चाई को स्वीकार भी करते हैं।
कोर्ट का काम भी प्रभावित
पुलिस की कमी से जिले में न्यायिक कार्य भी काफी हद तक प्रभावित हो रहे हैं। कोर्ट मुहर्रिर से लेकर पैरोकार तक की ड्यूटी चुनाव में लगी है। हलकों के बीट कर्मी भी नहीं हैं। ऐसे में गवाही कराने, बंदी की पेशी कराने और सम्मन आदि तामील कराने जैसे महत्वपूर्ण काम प्रभावित हो रहे हैं। हालांकि न्यायिक अधिकारी भी पुलिस की मजबूरी समझते हैं पर इस स्थिति से वादों के प्रभावित होने का खतरा भी बना हुआ है।

छोटे फसाद, कल बनेंगे बवालेजान
स्थानीय स्तर पर चुनाव निपटते ही गांव-देहात में झगड़े शुरू हो गए हैं। गेहूं निकासी के बाद किसानों के खाली होते ही वैसे भी हर साल इन दिनों में झगड़ों की तादात बढ़ जाती है। तब पुलिस की मौजूदगी में इस तरह के करीब अस्सी फीसदी झगड़ों को समझौते के आधार पर निपटा दिया जाता था। बाकी में शांतिभंग और मुचलके जैसी निरोधात्मक कार्रवाई से दोनों पक्षों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव डालकर झगड़ों को रोक दिया जाता था। फिलहाल पुलिस की कमी से इस तरह के झगड़ों पर अंकुश नहीं लग पा रहा। विभागीय जानकार बताते हैं कि भविष्य में यही झगड़े हत्या जैसी बड़ी घटनाओं की वजह बन सकते हैं।

महिला पुलिस पर बढ़े जिम्मेदारी
जिले से भले ही भारी भरकम पुलिस स्टाफ बाहर गया हो पर महिला पुलिस अभी भी यहां अच्छी संख्या में है। इनमें से अधिकांश महिला जवान पुलिस लाइंस में कुछ शहर के थानों में तो बाकी विभिन्न पेशी कार्यालयों में तैनात हैं। इनकी एक मुख्य जिम्मेदारी महिला पीड़िता को अदालत और अस्पताल ले जाने की दिखती है। स्टाफ की किल्लत के दौर में महिला जवानों से महत्वपूर्ण कार्य लिया जा सकता है जो नहीं लिया जा रहा।


लोकसभा चुनाव को शांतिपूर्वक निपटाना शासन की प्राथमिकता है। इसमें पुलिस स्टाफ का जाना जरूरी था। स्टाफ के जाने से फर्क तो पड़ा है पर पीएसी और पीआरडी के सहारे कानून व्यवस्था बनाए रखने का पूरा प्रयास किया जा रहा है। महिला जवानों को भी समुचित जिम्मेदारी जी जा रही है। - अतुल सक्सेना, एसएसपी
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