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गुलड़िया भी बना था नमक सत्याग्रह का गवाह

Badaun Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
बदायूं। महात्मा गांधी के नमक सत्याग्रह की गवाह गुलड़िया की सरजमीं भी बनी थी। 1930 में नमक कानून तोड़ा गया था। इसमें प्यारे लाल भंडारी, गंगाराम, टीकाराम, विभूति प्रसाद, मुंशी हेतराम आदि कार्यकर्ताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। हालांकि इसके लिए उन्हें पहले संघर्ष करना पड़ा था। यह लोग पहले प्रभातफेरी निकालते हुए जुलूस की शक्ल में गुलड़िया पहुंचे। वहां नमकीन मिट्टी प्राप्त करनी चाही, लेकिन पुलिस के भय से वहां के लोगों ने इन्हें एक सप्ताह तक नमकीन मिट्टी नहीं दी। तब प्यारे लाल भंडारी ने कविता बनाकर पढ़ी-
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रोज आती है पुलिस ऊधम मचाने के लिए, हर तरह से गांव वालों को डराने के लिए, काम रुकता नहीं गांधी का यह हरगिज मगर, बात हर जाएगी कहने को जमाने के लिए, इस गुलड़िया के जमींदारों ने गांधी के लिए, एक पला मिट्टी न दी सांभर बनाने के लिए।
इस कविता के जादुई प्रभाव से मिट्टी के साथ-साथ जनसहयोग भी मिला। जनसमूह को देखकर पुलिस भाग खड़ी हुई और बड़ी धूमधाम से नमक कानून तोड़ा गया।
उसके बाद आठ अगस्त 1942 को गांधी जी ने नारा दिया कि अंग्रेजों भारत छोड़ो तथा करो या मरो। इसको लेकर पूरे देश में नेताओं की गिरफ्तारियां शुरु हो गईं। इसमें भी बाबू रघुवीर सहाय, चौधरी बदल सिंह, पंडित त्रिवेणी सहाय, प्यारे लाल भंडारी, प्रभूदास गांधी, कुंवर रुकुम सिंह गिरफ्तार कर लिए गए। सन 1947 में आजादी मिली तो सभी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी छूटकर बाहर आए और जशभन मनाया गया। जिले के भी हर गांव, कस्बे और नगर में विजय जुलूस निकाले गए। इसी जुलूस में शामिल लोग आज भी उस दिन की याद ताजा करते हैं। उन्होंने क्या-क्या कष्ट झेले, कैसे संघर्ष किया, आजादी के बाद से अब तक क्या परिवर्तन हुए इन सवालों के जवाब जानते हैं उन्हीं की जुबानी-

गोरे नहीं देते थे सुविधाएं

1947 को मेरी उम्र लगभग 15 साल की रही थी। गुलड़िया में विजय जुलूस निकाला गया, जिसमें मैं भी शामिल था। उससे पूर्व तो गोरे कोई सुविधाएं नहीं देते थे। न तो अच्छा पहन सकते थे न ही खा सकते थे। किसानों की हालत खराब थी। उन्हें पानी और खाद नहीं मिलता था। शिक्षा ग्रहण नहीं करने देते थे, वह इसलिए कि हमारे लोग ऊंचे पदों पर नौकरी करने लगेंगे। -नेतराम सिंह, निवासी गुलड़िया

जुलूस में हर व्यक्ति के सिर पर थी टोपी

देश आजाद होते ही पूरे देश में एक पत्र सभी लोगों को बांटा गया था, वह जिले में भी मिला। उस पर लिखा था कि आज हम स्वतंत्र हुए। पत्र मिलने के बाद सभी ने विजय जुलूस निकाला गया। इसमें बच्चे, युवा, बूढ़े सभी शामिल रहे। सभी के सिर पर गांधी वाली टोपी थी और सीने पर तिरंगा लगा हुआ था।- हरिप्रसाद सिंह, निवासी गुलड़िया

हिंदी को नहीं पसंद करते थे अंग्रेज

आजादी के समय मैं कक्षा सात में पढ़ता था। दहेमी गांव की धर्मशाला में स्कूल चलता था। उसमें हिंदी और उर्दू पढ़ाई जा रही थी। उसी दौरान एक अंग्रेज आए तो टीचर ने हिंदी में बात की तो उन्होंने शिक्षक को हेय दृष्टि से देखा और हिंदी न बोलने को कहा था। पहले भय का माहौल था। एक झुंड में लोग नहीं खड़े होते थे। -कन्हई सिंह, निवासी जिरौलिया

एक लेटर से हो जाता था काम

पहले अनुशासन था, एक पत्र से काम हो जाते थे, लेेकिन आज नेताआें की अप्रोच जरूरी हो गई। अंग्रेजों से लोग डरते थे। मैं प्राइवेट बस में बैठकर अपने छोटे भाई के साथ ककोड़ा मेला जा रहा था। भाई का आधा टिकट होने के कारण उसे उतारा जा रहा था और मैं भी उसके साथ उतर गया। आगे पता चला कि वह बस पलट गई और सात लोगों को मौत हो गई। मैं उस दिन को आज भी याद करता हूं।-डॉ. शिवओम वार्ष्णेय, सिविल लाइन

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