गर्मी और ठंड के दिन बढ़ने का कारण ग्लोबल वार्मिंग

Badaun Updated Tue, 05 Jun 2012 12:00 PM IST
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कैलाश सिंह
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बदायूं। ग्लोबल वार्मिंग से पर्यावरण प्रदूषित हो रहा है। मौसम में हो रहे बदलाव के कारण गर्मी और ठंड के दिन बढ़ रहे हैं और बारिश बाधित हो रही है। परिणामस्वरुप मार्च तक ठंड और अक्तूबर माह तक बारिश हो रही है। इसका असर कृषि पर प्रतिकूल हो रहा है। अचानक तेज बारिश होना, ओले पड़ना और पानी जल्दी बह जाना भी इसी से जुड़ा है। जमीन भी पानी को अवशोषित नहीं कर पाती। सूखा और बाढ़ जैसे हालात का भी इसी का नतीजा हैं। रेगिस्तान में बारिश होना भी संतुलन को बिगाड़ रहा है।
यह जानकारी बदायूं के मूल निवासी और भारतीय उष्णदेशीय मौसम विज्ञान संस्थान पुणे में शोध विज्ञानी आलोक सागर गौतम ने दी है। उनका कहना है कि मौसम परिवर्तन की सभी घटनाओं का कारण हरित ग्रह प्रभाव बना है। (वह गैसें जो संतुलन बनाती हैं पर इनकी बढ़ती मात्रा से असंतुलन बढ़ रहा है) इसी के चलते ग्लोबल वार्मिंग विकराल होती जा रही है।
क्या है हरित ग्रह प्रभाव
वायुमंडल में क्लोरो फ्लोरो कार्बन, कार्बन डाइआक्साइड, मीथेन, नाइट्रस आक्साइड, वाष्प आदि गैसों का सांद्रण लगातार बढ़ रहा है। इसे हरित ग्रह प्रभाव कहा जाता है। इसी के कारण पृथ्वी का तापमान बढ़ता जा रहा है। ओजोन परत के छेद के बढ़ने का कारण भी यही बन रहा है। वातावरण में जल वाष्प और कार्बन डाइआक्साइड का सांद्रण बढ़ता है तो यह पृथ्वी की सतह से वापस जाने वाले सौर्य विकिरण को रोक देते हैं और पृथ्वी की सतह का तापमान बढ़ाते हैं।
पृथ्वी से निकलती हैं आपरित सौर्य विकिरण
पृथ्वी पर आपरित सौर्य विकिरण 100 यूनिट है। इसकी 16 यूनिट ओजोन गैस, चार यूनिट बादलों द्वारा, 50 यूनिट पृथ्वी और वाष्प एवं ऐरोसोल द्वारा भी कुछ यूनिट अवशोषित होते हैं। शेष 30 यूनिट सौर्य विकिरण वापस पृथ्वी पर फैल जाते हैं। इसमें 6 यूनिट हवा से, 20 यूनिट बादलों से और चार यूनिट पृथ्वी से परावर्तित हो जाते हैं।

चार दशक में तीन गुना बढ़ा तापमान
माना गया है कि वर्ष 1900 से 2000 तक पृथ्वी के औसतन तापमान में एक डिग्री की वृद्धि हुई है। वर्ष 1970 से अब तक पृथ्वी के तापमान में तीन गुना वृद्धि दर्ज की गई है।

यहां से होता है गैसों का उत्सर्जन
यातायात और गाड़ियों से 14 प्रतिशत
आद्यौगीकरण से 16.8 प्रतिशत
खेती किसानों के उत्पादों से 12.5 प्रतिशत
कचरा जलाने से 3.4 प्रतिशत
पावर स्टेशन से 21.3 प्रतिशत

ग्लोबल वार्मिग से बचाव
-वनों के कटाव को रोकना जरूरी है और पौधारोपण पर अधिक जोर देना चाहिए।
-ऊर्जा के संसाधन जैसे सौर उर्जा, पवन उर्जा पर अधिक ध्यान दिया जाना चाहिए। इसके लिए नई-नई तकनीक विकसित की जानी चाहिए।
-विज्ञान और अनुसंधान पर अधिक जोर दिया जाना चाहिए ताकि शोध के द्वारा नई-नई तकनीक प्रणालियां विकसित हो सकें।
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