करोड़ों खर्च, फिर भी बाल श्रमिक रहे अनपढ़

Badaun Updated Tue, 08 May 2012 12:00 PM IST
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अनूप गुप्ता
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बदायूं। करोड़ों खर्च होने के बाजवूद बाल मजदूर अनपढ़ रह गए। जिलेभर के ज्यादातर श्रम स्कूल कागज पर ही चल रहे हैं। वहां न तो बच्चे पहुंच रहे और न ही उन्हें मध्याह्न भोजन ही मिल पा रहा है। इतना जरूर है कि रजिस्टर पर बच्चों की हाजिरी भरकर वजीफा और मिड डे मील के लाखों के बिल तैयार करने में कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी जा रही। ऐसे स्कूलों पर शिकंजा न कसकर श्रम प्रवर्तन विभाग भी सवालों के घेरे में है।
बाल श्रमिकों को चिन्हित कर उन्हें साक्षर बनाने के लिए वर्ष 2006 में नेशनल चाइल्ड डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत बाल श्रम स्कूल खोले गए थे, जिन्हें चलाने की जिम्मेदारी एनजीओ को सौंपी गई। प्रत्येक स्कूल में 50 बच्चों को दाखिला दिया जाना था। इसके लिए सरकार ने प्रत्येक स्कूल केलिए दो अनुदेशकों, एक व्यवसायिक प्रशिक्षक, एक लिपिक और एक आया के पद स्वीकृत किए थे। स्टाफ का मानदेय देने के साथ ही बच्चों का वजीफा, मिड डे मील, स्कूल भवन का किराया, फर्नीचर आदि खर्चे सरकार को देने थे। इन स्कूलों की निगरानी नहीं की गई, जिसका नतीजा यह रहा कि ये स्कूल चलते रहे, लेकिन कागज पर। वजीफा और मध्याह्न भोजन बच्चों को भले ही न बंटते हो लेकिन उनके भारी-भरकम बिल बनाने में कोई कमी नहीं छोड़ी गई। ऐसे में बाल श्रम स्कूलों पर सरकार भले ही हर साल लाखों खर्च करती रही हो, लेकिन बाल मजदूरों की तकदीर नहीं बदल पा रही।
ये रहा बाल स्कूलों का हाल :
स्कूल में पढ़ने नहीं आते बच्चे

शहर के नई सराय में ग्रामोद्योग विशेष बाल श्रमिक स्कूल तो है लेकिन नाम का। वहां न तो पढ़ने के लिए बच्चे आ रहे हैं और न ही वहां का स्टाफ बच्चों को स्कूल लाने में दिलचस्पी ले रहा है। वहां सिर्फ एक शिक्षा अनुदेशक खुशबू राठौर, लिपिक रागिनी सक्सेना, व्यवसायिक प्रशिक्षक उषा और चतुर्थ श्रेणी चंदा बी पहुंचकर उपस्थिति पंजिका को पूरा कर रही हैं। उन सभी का कहना बजट न उनका काफी समय से मानदेय नहीं मिला है।

अक्सर बंद रहता है स्कूल

नई सराय तृतीय में बना बाल श्रम स्कूल अक्सर बंद रहता है। यहां बच्चों का आना तो दूर, स्टाफ का भी कोई अता-पता नहीं रहता है। जो बच्चे पढ़ने के लिए आते भी है तो स्कूल बंद न मिलने से वे वापस चले जाते हैं। आसपास के लोगों का कहना है कि स्कूल नियमित तौर से नहीं खुलता।

कहीं बच्चें नहीं तो कहीं स्कूल बंद

उझानी के मोहल्ला बहादुरगंज में विद्या मंदिर इंटर कॉलेज में बाल श्रम स्कूल है लेकिन यहां बच्चे नहीं आ रहे। स्कूल संचालक अतर सिंह का कहना है कि बच्चों की परीक्षा हो चुकी हैं। इसके अलावा कस्बे के गंजशहीदा में रेलवे क्रासिंग के पास चल रहा स्कूल काफी समय से बंद हैं।

हर साल होती करीब सवा करोड़ की मांग
प्रत्येक बाल श्रम स्कूल के लिए हर वर्ष के लिए 10 हजार रुपये शैक्षिक, व्यवसायिक सामग्री और चार हजार रुपये फर्नीचर खर्च का मिलता है। इसके अलावा बच्चों की छात्रवृत्ति और मध्याह्न भोजन और स्टाफ के मानदेय का
56 स्कूल और 5610 बाल श्रमिकों के रजिस्ट्रेशन
राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना के तहत विभिन्न एनजीओ 56 स्कूल संचालित हो रहे हैं, जिसमें 5610 बाल श्रमिकों के रजिस्ट्रेशन भी हैं। यह बात दीगर है कि मौके पर ज्यादातर न तो स्कूल चल रहे हैं और न ही बच्चे दिखाई दे रहे।

बाल श्रम स्कूलों के लिए बजट की कमी
इस परियोजना का पर्याप्त बजट नहीं मिल पा रहा। पिछले साल 54 लाख मिले थे, जिसमें 34 लाख का भुगतान एनजीओ को कर दिया गया था। अभी एक साल का भुगतान लटका हुआ है। इसके बाजवूद कोशिश की जा रही है कि बाल श्रम स्कूल चलते रहे।
केके सिंह, बाल श्रम प्रवर्तन अधिकारी
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