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नई सुतली नया कपास, देव उठेंगे कार्तिक मास

Badaun Updated Tue, 04 Nov 2014 05:30 AM IST
मेला ककोड़ा। गंगा स्नान के बाद लोगों ने जहां गंगा मां का स्तवन और पूजन किया, वहीं अपने-अपने कैंपों में पहुंचकर ऋतु फलों में सिंघाड़ा, नई फसल में गन्ना, रुई, चावल, खिचड़ी आदि के साथ देव उठाए गए। लोगों ने धूप-दीप, नैवेद्य अर्पण कर उठे हुए देवों की प्रार्थना की और घर-परिवार के लिए मंगल कामनाएं कीं। मेला में अपने यौवन पर पहुंचता जा रहा है लेकिन व्यवस्थाओं में अभी भी लोच बना हुआ है। घाटों की कटान ठीक न होने से गंगा की तट से निचाई बनी हुई है।
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सरकस, झूले, दुकानें आदि लगकर लगभग तैयार हो चुके हैं। दुकानों की सजावट हो रही है। मेला का सुप्रसिद्ध खजला हो हो या जलेबी इनके कारीगर काम में जुट गए हैं। मोतीचूर के लड्डू भी बनाए जा रहे हैं। देहात के मेला के हिसाब से माहौल बनकर तैयार है। यही यहां का आकर्षण है। कटरी में दूर-दूर तक जंगल और गंगा का किनारा इस बीच बसा तंबुओं का शहर अपनी अलौकिक छटा बिखेर रहा है। तंबुओं का विस्तार होता जा रहा है। रात को गंगा का मनोरम दृश्य देख यहां कल्पवास कर रहे लोग गदगद हो रहे हैं। जिस प्रकार लोग सुविधाओं की कल्पनाएं करके मेला जा रहे हैं, उन्हें वहां उतनी सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं। हैंडपंप और शौचालय बनवाने को मेला के ठेकेदार कई-कई चक्कर लगवा रहे हैं।

गंगा का जलस्तर घटा
गंगा के जल के बढ़ने से प्रशासन को चिंता सता रही थी लेकिन गंगा स्नान के मुख्य पर्व से पहले गंगा का जलस्तर घट जाने से अब स्नान के लिए स्थान ठीक हो गया है लेकिन घाट का कटान सुविधा जनक नहीं हुआ है। इससे स्नानार्थियों को कठिनाई का सामना करना पड़ेगा।

मेला तक होर्डिंग्स से पटने लगे रोड
कादरचौक से लेकर मेला तक रोड पर गंगा स्नान की शुभकामनाओं के होर्डिंग्स पट गए हैं। राजनीतिक पार्टियों में इसके लिए होड़ लगी हुई है। भीड़ को अपना चेहरा दिखाने वाले नेताओं में इसकी होड़ लगी हुई है।

मल्लाहों को नहीं मिली ड्रेस
घाट पर लगे मल्लाहों को अभी तक ड्रेस नहीं मिली है। घाट पर तैनात मल्लाहों की पहचान इसी से होती है। मल्लाहों ने भी कहा है कि बिना ड्रेस के वे लोगों में अपनी खास पहचान नहीं बना पाएंगे।

एप्रोच पर होता है प्लॉट आवंटन
गंगा की कटरी जो वीरानी की कहनी कहती रही है। मेला के समय बेशकीमती हो गई है। यहां कल्पवास को आने वाले लोग महत्वपूर्ण जगह पाने के लिए जिला पंचायत से एप्रोच कराते हैं। बड़े-बड़े नेता और प्रभावी लोग इसके लिए सिफारिशें भी करते हैं लेकिन यह पर्दे के पीछे का खेल होता है। आवंटन के लिए मेला में किससे कितने की रसीद कटाई जा रही है, इस बात को तो सब जानते हैं लेकिन एप्रोच के बारे में सबको जानकारी नहीं हो पाती है।
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