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कहीं अन्न की बर्बादी, कहीं भुखमरी से मौतें

बीबीसी हिन्दी

Updated Sat, 27 Oct 2012 03:56 PM IST
people die due to wastage of grains
क्या आपको पता है कि खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों के कारण 10 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं जबकि दुनिया में एक तिहाई खाना वेबजह बर्बाद हो जाता है?
खाद्यान्नों की बढ़ती कीमतें चिंता का बड़ा विषय बना हुआ है। दरअसल बिना पानी के फसलें फल-फूल नहीं सकतीं और फसलों की पैदावार नहीं होगी तो दुनिया का पेट कैसे भरेगा? इस साल कुछ ऐसा ही हुआ है।

भारत में मॉनसून के दौरान पर्याप्त बारिश नहीं हुई, अमरीका को पिछले 50 सालों में अपना सबसे भीषण सूखा झेलना पड़ा और रूस भी पानी के लिए तरसता रहा।

इसका सीधा-सीधा नतीजा ये हुआ है कि फसलें नष्ट हो गई और अनाज की कीमत बढ़ गई- करीब उतनी ही जितने चार साल पहले थी।

जनसंख्या में वृद्धि और विकसित देशों में बढ़ता मध्यम वर्ग खाद्यन्नों की माँग को बढ़ा रहा है। ऊर्जा की बढ़ती कीमत के कारण सामग्री सप्लाई करने की कीमतों में भी वृद्धि हो रही है. यानी खाद्यान्न महंगे दामों में ही मिलेंगे।

इस सदी के अंत के बाद से ही विश्व में अन्न का भंडार पहले के मुकाबले कम हैं- गेहूँ के भंडार में एक तिहाई की कमी आई है, चावल में 40 फीसदी और मक्के के भंडार में 50 फीसदी कमी हुई है।

मौसम की मार
विश्व बैंक में अर्थशास्त्री मार्क सैडलर कहते हैं कि ये भंडार बढ़ने वाले नहीं है और अगर कुछ भी बुरा होता है ( जैसे सूखा) तो इन भंडारों पर प्रतिकूल असर पड़ेगा।

मौसम में बदलाव आम बात होती जा रही है। विशेषज्ञ जलवायु परिवर्तन को दोष देने में सकुचा रहे हैं लेकिन मानते हैं कि बढ़ते तापमान के कारण बारिश पर असर पड़ रहा है।

अगर विशेषज्ञ सही हैं तो मौसम में ज़बरदस्त बदलावों का सिलसिला जारी रहेगा। शायद विकसित देशों पर इसका कम असर पड़े क्योंकि वहाँ दुकानों में बिकने वाली खाद्य सामग्री में कच्चा अनाज बहुत कम मात्रा में इस्तेमाल होता है। जैसे ब्रेड में गेहूँ एक छोटा सा अंश है।

सस्ता खाना अब नहीं
अर्थशास्त्री जेम्स वाल्टन कहते हैं, “सस्ते खाने का ज़माना अब जा चुका है। अन्न मिलता रहेगा लेकिन कीमत कम नहीं होगी।” जबकि विकासशील देशों में रहने वाले गरीब लोगों पर असर ज़्यादा होगा क्योंकि वे अनाज खरीदकर अपना खाना खुद तैयार करते हैं और वे खाने पर अपनी आमदनी का ज़्यादा हिस्सा खर्च करते हैं।

चार साल पहले अनाज की बढ़ी कीमतों के कारण 12 देशों में दंगे हो गए थे और संयुक्त राष्ट्र को खाद्यान्न संकट पर सम्मेलन बुलाना पड़ा था। इस साल हुई कम बारिश के कारण फिर आशंका जताई जा रही है कि दोबारा अनाज के दाम बढ़ जाएँगे।

हालांकि कई विशेषज्ञ मानते हैं कि हालात चार साल पहले जितने बुरे नहीं है। सबसे अहम बात ये है कि देशों के पास अनाज के भंडार है। साथ ही ये भी अहम है कि रूस जैसे उत्पादक देशों ने निर्यात पर प्रतिबंध नहीं लगाए हैं।

निर्यात पर प्रतिबंध के कारण चार साल पहले कीमतों में ज़बरदस्त बढ़ोतरी हुई थी। क्योंकि विश्व रूस, कज़ाखस्तान जैसे देशों पर गेहूँ के लिए निर्भर था।

संयुक्त राष्ट्र की खाद्य और कृषि संगठन में वरिष्ठ अर्थशास्त्री अब्दुलरेज़ा अब्बासाइन कहते हैं, “2008 में अनाज की बढ़ी कीमतों का एक कारण था बायोईंधन की माँग। लेकिन इस बार बायोईंधन की माँग कम रही है।

2008 में तेल की कीमतों में ज़बरदस्त वृद्धि के कारण लोग बायोईंधन इस्तेमाल करने लगे थे। अब तेल की कीमत काफी कम हो चुकी है। संयुक्त राष्ट्र का कहना है कि अब कम फसलों को बाओईंधन बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है।”

सबका पेट भरना है....
हालांकि हालात पहले जैसे खराब नहीं है लेकिन अनाज की कीमत आज भी काफी ज़्यादा है और बढ़ी हुई कीमतों के लिए ज़िम्मेदार कारण आगे भी बने रहेंगे।

अर्थशास्त्री मार्क सैडलर पूछते हैं, “दुनिया की आबादी जल्द ही नौ अरब हो जाएगी और सबका पेट भरना है। इस सदी की सबसे बड़ी चुनौती यही होगी कि कैसे सबका पेट भरा जाए।”

ऐसे में अन्न की फिज़ूलखर्ची रोकने से शुरुआत हो सकती है क्योंकि एक तिहाई खाना ऐसे ही नष्ट हो जाता है। साथ ही कृषि में बड़ै पैमाने पर निवेश की ज़रूरत है। अगर ऐसा नहीं हुआ तो इसका परिणाम विनाशकारी हो सकता है।

क्या कहते हैं आँकड़ें
एक तिहाई खाना वेबजह बर्बाद हो जाता है।
अमीर देशों में ग्राहक उतना खाना बर्बाद कर देते हैं जितना सब-सहारा अफ़्रीका में उत्पादन होता है।
सब लोगों का पेट भरना है तो 2050 तक 70 फीसदी और अनाज पैदा करना होगा।
मक्के का भंडार 1998 के बाद से आधा हो गया है।
खाद्य पदार्थों की बढ़ी कीमतों के कारण 10 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं।
विश्व में आठ में से एक के पास पर्याप्त खाना नहीं है।
( स्रोत: संयुक्त राष्ट्र, अमरीकी कृषि विभाग)

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