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फलस्तीनी प्राधिकरण का दर्जा बढ़ने के मायने

Santosh Trivedi

Santosh Trivedi

Updated Fri, 30 Nov 2012 07:56 PM IST
meaning of palestinians state status
फलस्तीनी प्राधिकरण को संयुक्त राष्ट्र में जोरदार समर्थन के साथ पर्यवेक्षक राष्ट्र का दर्जा दे दिया गया है। फलस्तीनी इसे अपनी बड़ी जीत मान रहे हैं, लेकिन फिलहाल इसका अर्थ सांकेतिक ही ज्यादा है।
फलस्तीनी लोग लंबे समय से पश्चिमी तट पर एक स्वतंत्र और संप्रभु राष्ट्र की मांग करते रहे हैं जिसमें पूर्वी यरुशलम और गज़ा पट्टी भी शामिल हों। इसराइल ने 1967 में छह दिन तक चले युद्ध के दौरान इन इलाकों पर कब्जा कर लिया था।

वर्ष 1993 के ऑस्लो समझौते के बाद फलस्तीनी मुक्ति संगठन (पीएलओ) और इसराइल ने एक दूसरे को मान्यता दी। लेकिन दो दशक तक शांति वार्ता के बावजूद फलस्तीनी समस्या का स्थाई समाधान नहीं निकल पाया है। दोनों के बीच सीधी बातचीत आखिरी बार 2010 में हुई थी।

उसके बाद से फलस्तीनी अधिकारियों ने एक नई कूटनीतिक रणनीति अपनाई जिसके तहत उन्होंने विभिन्न देशों से फलस्तीन को एक स्वतंत्र राष्ट्र की मान्यता देने के लिए कहा।

क्या बदलेगा
वर्ष 2011 में फलस्तीनी प्राधिकरण के अध्यक्ष और पीएलओ के अध्यक्ष महमूद अब्बास ने 1967 से पहले की सीमाओं के आधार पर संयुक्त राष्ट्र से फलस्तीन को पूर्ण सदस्य का दर्जा देने की मांग की। लेकिन उनकी ये मांग विफल रही क्योंकि सुरक्षा परिषद के सदस्यों का कहना था कि वो इस सुझाव पर "सहमति बनाने में नाकाम रहे।

महमूद अब्बास ने फलस्तीन के लिए फिर गुरुवार को संयुक्त राष्ट्र महासभा में ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक राष्ट्र दर्जे की मांग रखी, जिसे भारी समर्थन से मंजूर कर लिया गया। महासभा में वैटिकन का भी यही दर्जा है। अब फलस्तीनियों के संयुक्त राष्ट्र की संस्थाओं और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक अदालत (आईसीसी) में शामिल होने की संभावनाएं भी बढ़ जाएंगी। हालांकि ऐसा होना तय नहीं है।

अगर फलस्तीन को आईसीसी की स्थापना संधि पर हस्ताक्षर करने की अनुमति मिलती है, उस स्थिति में फलस्तीनी लोग पश्चिमी तट पर इसराइल के कब्ज़े जैसे मुद्दे को अदालत में चुनौती दे पाएंगे। वैसे 1967 से पहले खिंची युद्धविराम सीमाओं के आधार पर फलस्तीन राष्ट्र को मान्यता मिलना महज़ प्रतीकात्मक होगा।

'बातचीत पर होगा असर'
हालांकि फलस्तीन समस्या के स्थाई समाधान के लिए पहले ही इन सीमाओं के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति है। लेकिन मुश्किल ये है कि इसराइल के प्रधानमंत्री बेन्यामिन नेतन्याहू इन सीमाओं को बातचीत का आधार नहीं मानते।

नेतन्याहू कहते हैं कि 1967 के बाद से कई ज़मीनी बदलाव आए हैं। पूर्वी यरुशलम सहित पश्चिमी तट पर 200 से ज़्यादा बस्तियों और आउटपोस्टों में लगभग पांच लाख यहूदी रहते हैं। अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के तहत ये बस्तियां ग़ैर-क़ानूनी हैं लेकिन इसराइल इस दावे को नहीं मानता।

फलस्तीनियों का मानना है कि संयुक्त राष्ट्र में ग़ैर-सदस्य पर्यवेक्षक राष्ट्र का दर्जा मिलने से इसराइल के साथ शांति वार्ता में कई मुद्दों पर उनका पक्ष मज़बूत हो जाएगा। इनमें यरुशलम का दर्जा, सीमा विवाद, जल अधिकार और सुरक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दे शामिल हैं। उधर इसराइल का कहना है कि संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीन के दर्जे में वृद्धि से इस मुद्दे के समाधान की बातचीत पर असर पड़ेगा।

विरोध की वजह
न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय से बीबीसी संवाददाता बारबरा प्लेट के मुताबिक फलस्तीनी राष्ट्रपति महमूद अब्बास का ये कदम मुख्यत: प्रतीकात्मक है। लेकिन फलस्तीनी नेतृत्व का कहना है कि इससे कम-से-कम वो क्षेत्र स्पष्ट हो जाएगा जिसकी मांग फलस्तीनी कर रहे हैं और इससे फलस्तीनी राष्ट्र को मान्यता मिलेगी।

संयुक्त राष्ट्र में फलस्तीनी राजदूत रियाद मंसूर ने इसे "दो-राष्ट्र समाधान को बचाने" की दिशा में एक अहम कदम बताया है। लेकिन शायद इसराइल और उसके निकटतम सहयोगी अमरीका का सबसे बड़ा डर ये है कि फलस्तीनी अपने नए दर्जे का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) में शामिल होने और कब्ज़े वाले इलाकों में 'युद्ध अपराधों' के लिए इसराइल पर मुकदमा करने की कोशिश करेंगे।

अमरीका, ब्रिटेन और यूरोपीय देश फलस्तीनी प्राधिकरण पर ऐसा कोई कदम न उठाने का दबाव डालते रहे हैं। हालांकि फलस्तीनी प्राधिकरण ने साफ किया है कि ये उसकी प्राथमिकता नहीं होगी लेकिन उसने इस विकल्प को छोड़ने की बात भी नहीं कही है।
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