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चीन की सत्ता अमेरिका से ज्यादा वैध है?

बीबीसी हिंदी (मार्टिन ज़ाक, अर्थशास्त्री)

Updated Tue, 06 Nov 2012 05:25 PM IST
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चीन और अमेरिका अपने नए नेताओं का चुनाव कर रहे हैं लेकिन अलग-अलग तरीक़ों से। लेकिन किस नेता को ज्यादा वैध माना जाए। उसे जिसे लाखों लोग मतदान के ज़रिए चुनते हैं या फिर उसे कुछ लोग नियुक्त करते हैं।
इस हफ्ते इसी असाधारण असमानता का निर्धारण होना है। मंगलवार को अमेरिका का नया राष्ट्रपति चुना जाएगा और उसके दो दिन बाद चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के 18वें सम्मेलन में देश के नए राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री का चयन किया जाएगा। दुनिया के दो बड़े देश लेकिन व्यवस्थाएं एकदम जुदा।

अमेरिका में जहां लाखों लोग मंगलवार को मतदान के लिए घर से निकलेंगे वहीं चीन में देश के अगले नेता का चुनाव बंद कमरों के भीतर केवल कुछ लोगों द्वारा किया जाएगा।

सत्ताओं में फर्क़
आप सोच रहे होंगे कि अमेरिका में कितना अच्छा हो रहा है और चीन में कितना बुरा क्योंकि वहां लोकतंत्र नहीं है। लेकिन मैं इस तर्क से इत्तेफाक़ नहीं रखता।

आप सोचते होंगे कि किसी राज्य और सरकार की वैधता या उसकी सत्ता केवल पश्चिमी मॉडल वाले लोकतंत्र में ही संभव है। लेकिन असलियत ये है कि लोकतंत्र होना ही उसके वैध होने का प्रमाण नहीं है।

इटली का उदारहण हमारे सामने है। वहां लगातार चुनाव होते रहे हैं लेकिन उसकी समस्या ये है कि राज्य में वैधता की कमी है। देश की आधी आबादी उसमें यक़ीन ही नहीं करती।

अब मैं एक चौंकानेवाली बात करता हूं। चीन की सरकार को वहां की जनता किसी भी पश्चिमी देश से ज़्यादा पसंद करती है, उसे लोगों की वैधता हासिल है। लेकिन इसकी वजह क्या है?

इतिहास
इसके लिए इतिहास में झांकने की ज़रूरत है। चीन कोई राष्ट्रराज्य नहीं बल्कि सभ्यता परस्त देश रहा है। चीनियों के लिए सभ्यता बहुत बड़ी चीज़ है जबकि पश्चिम में राष्ट्र को सर्वोपरि माना जाता है। चीन में सबसे महत्वपूर्ण राजनीतिक मूल्य सभ्यता की एकता और अखंडता रही है।

अगर देश के आकार और उसकी विविधता को देखें तो ये सोच बहुत जटिल लगती है। सन् 1840 से लेकर 1949 तक चीन पर औपनिवेशिक शक्तियों का कब्ज़ा था और देश तरबूज़ की तरह कई हिस्सों में बंटा हुआ था। चीन लोग इस अवधि को देश अपमान की सदी के रूप में देखते हैं।

चीनियों की नज़र में राज्य की सबसे बड़ी जिम्मेदारी यही है कि वो सभ्यता की रक्षा करे और देश की एकता को बनाए रखे। जो सरकार ऐसा नहीं कर पाती उसका पतन हो जाता है। आप पूछ सकते हैं कि क्या वाक़ई चीन को देश की जनता का समर्थन और वैधता हासिल है?

चीन की जनता
हारवर्ड विश्वविद्यालय के 'केनेडी स्कूल ऑफ़ गवर्नमेंट' से जुड़े टोनी सैच ने कई सर्वेक्षणों के आधार पर पाया कि 80 से 95 प्रतिशत चीनी लोग केंद्र सरकार के प्रदर्शन से बेहद खुश हैं।

उसी तरह 'प्यू ग्लोबल एटीट्यूड सर्वे' ने 2010 में पाया कि 91 फीसदी चीनी मानते हैं कि देश की सरकार अर्थव्यवस्था को सही तरीके से चला रही है जबकि ब्रिटेन के बारे में ये आंकड़ा मात्र 45 फीसदी था। लेकिन आम लोगों में इतने ज़्यादा संतोष का मतलब ये नहीं कि चीन में विरोध के स्वर नहीं उठते।

2010, 2011 में ज्यादा मजदूरी को लेकर देश के ग्वांगदोंग प्रांत में कई हड़तालें हुई थीं। किसानों के प्रदर्शन भी देश में आम हैं जो स्थानीय अधिकारियों द्वारा उनकी ज़मीन हड़पे जाने का विरोध करने के लिए सड़कों पर उतर आते हैं।

लेकिन ऐसे प्रदर्शन केंद्र सरकार के प्रति जनता के मूल संतोष के भाव में कोई बदलाव नहीं ला पाते। दरअसल वहां के लोग राज्य को परिवार के मुखिया के रूप में देखते हैं और ये मानते हैं कि परिवार ही वो इकाई है जो देश को बनाती है। यही वजह है कि चीन की सरकार को लोगों का भारी समर्थन रहता है।

चीन की अर्थव्यवस्था
अगर अर्थव्यवस्था की बात करें तो चीन ने पिछले 30 वर्षों में 10 फीसदी की दर से वार्षिक विकास किया है। ब्रिटेन में 18वीं सदी में हुई औद्योगिक क्रांति के बाद से दुनिया ने किसी भी अन्य देश में इतना स्थिर आर्थिक विकास नहीं देखा है।

हालांकि चीन अभी एक गरीब विकासशील देश ही है लेकिन राष्ट्र के रूप में दुनिया में ये महत्वपूर्ण शक्ति के रूप में खड़ा है।

आधारभूत संरचना
अगर आधारभूत संरचना की बात करें तो चीन ने जो हासिल किया है उसका लोहा अब पश्चिमी देश भी मानने लगे हैं। उसका तेज़ रफ्तार रेल नेटवर्क दुनिया में सबसे बड़ा है और जल्दी ही पूरी दुनिया के सामूहिक रेल नेटवर्क से वो बड़ा हो जाएगा।

चीन की ज्यादातर बड़ी-बड़ी और प्रतिस्पर्धी कंपनियां सरकारी स्वामित्व में चलती हैं। वहां की एक शिशु नीति को अब भी देश की जनता का समर्थन हासिल है। और आज जबकि पश्चिम की अर्थव्यवस्थाएं संकट का सामना कर रही हैं, चीन की अर्थव्यवस्था तेज़ी से आगे बढ़ रही है।

जिस तरह चीन आर्थिक विकास कर रहा है और उसकी शक्ति बढ़ती जा रही है, उसे देखकर अब ऐसा नहीं लगता कि हमें उन्हें ये बताने की ज़रूरत रह गई है कि वो हमारे जैसे किस तरह हो सकते हैं।

आज तक चीन की राज्यव्यवस्था को पश्चिम में उसकी कमी के रूप में देखा जाता था लेकिन जिस तरह उसने अपना विकास किया है उससे यही साबित हुआ है कि यही व्यवस्था उसकी सबसे बड़ी ताकत है।

अब पूर्व की ओर
आज का चीन राज्य और समाज के बीच के अनोखे संबंधों के आधार पर विकसित हुआ है और एक सीमा से परे पश्चिम के लिए उस जैसा होना असंभव ही है। लेकिन इसका मतलब ये क़तई नहीं है कि हम चीनी राज्य से कुछ सीख नहीं सकते। चीन ने तो पश्चिम से बहुत कुछ सीखा है।

अगले छह साल में चीन की अर्थव्यवस्था आकार में अमेरिका से बड़ी हो जाएगी और 2030 में काफी आगे निकल जाएगी।

अब समय आ गया है कि दुनिया से प्रभावित होगी। पिछली दो सदियों में दुनिया ने हर बात के लिए पश्चिम की ओर देखा है लेकिन भविष्य में वो पूर्व की तरफ़ देखेगी।
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