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तालिबान का वो ख़ौफ़नाक 'युवा कमांडर'

बीबीसी हिंदी/बिलाल सरवरी

Updated Wed, 28 Nov 2012 09:20 AM IST
dreadful young commander taliban
ओबैदुल्ला सफ़ी ने महज़ किशोरावस्था को ही पार किया गया होगा, जब वो अफ़ग़ानिस्तान के कुनार प्रांत की सीमा पर युद्घ कर रहा था। सफ़ी का जन्म हालांकि 1992 में ही हुआ था लेकिन उसने अफ़ग़ानिस्तान में सत्ता के लिए सदियों से संघर्ष कर रहे लोगों के विभिन्न रूपों मसलन वफ़ादारी, धोखाधड़ी, घात-प्रतिघात जैसे तमाम अनुभव हासिल कर लिए हैं।
जिन दिनों उसके साथ के लड़के खेलने में और लड़कियों का पीछा करने में व्यस्त थे, उस वक्त ओबैदुल्ला सीमा पर लड़ने में मशगूल था और अफ़ग़ान संघर्ष के दौरान उसे दोनों तरफ़ से बंदी बनाया गया। ओबैदुल्ला 16 साल की उम्र में तालिबान की सेना में शामिल हुआ और अफ़ग़ानिस्तान और पाकिस्तान में नैटो सेनाओं के ख़िलाफ़ उसने कई भीषण लड़ाइयां लड़ीं।

तीन साल बाद उसने अपना पाला बदल लिया और तालिबान के खिलाफ युद्ध में अफ़ग़ान सरकार की मदद करने लगा। इस साल की शुरुआत में जब मैंने उससे मुलाक़ात की, उस वक्त उसे स्थानीय पुलिस का प्रमुख बना दिया गया था और साठ लोग उसके अधीन काम कर रहे थे।

वहीं तालिबान ने ओबैदुल्ला के ऊपर इनाम घोषित किया था और उसे ये भी बताया गया था कि तालिबान उसके बदले में अपने पचास चरमपंथियों को कुर्बान करने को तैयार है। लेकिन इसके बाद उसकी कहानी में एक और मोड़ आ गया। इस इंटरव्यू के बाद ओबैदुल्ला को गिरफ़्तार कर लिया गया और उस पर एक प्रमुख कबायली नेता की हत्या का अभियोग लगा। ये वही व्यक्ति थे जिन्होंने अपनी रिहाई के लिए कुछ साल पहले तालिबान को फिरौती दी थी। हालांकि ओबैदुल्ला ने आरोपों से इंकार किया है।

तालिबान प्रशिक्षण

अफ़ग़ानिस्तान के खुफिया विभाग में काम करने वाले मेरे एक मित्र ने ओबैदुल्ला से मेरी मुलाकात पहाड़ के पास एक वीरान घर में कराई। तपती धूप में करीब 45 मिनट के इंतज़ार के बाद एक मोटर साइकिल उधर से गुज़री। मोटर साइकिल सवार ने गर्मी और धूप से बचने के लिए अपने चेहरे और सिर पर कपड़ा बाँध रखा था।

कुछ ही क्षणों में मोटर साइकिल वापस आई। मोटर साइकिल खड़ी करते ही उस व्यक्ति ने मुझसे पश्तो भाषा में कहा, ''कैसे हो बिलाल?'' ओबैदुल्ला की लंबाई कोई पांच फीट होगी लेकिन उसका शारीरिक गठन एथलीटों की तरह था और वो अपनी 19 साल की उम्र से कहीं ज्यादा का लग रहा था।

उसने बताया, ''जब तालिबान ने मुझसे संपर्क किया, उस वक्त मैं स्थानीय स्कूल में आठवीं कक्षा में पढ़ता था और भविष्य में इंजीनियर बनने का ख़्वाब देख रहा था। कुनार प्रांत के बारे में मेरी जानकारी ने उन्हें प्रभावित किया।'' तीन साल पहले कुनार प्रांत बेहद अस्थिर था और वहां तालिबान और नैटो सेनाओं के बीच आए दिन संघर्ष होते थे।

वो बताता है, ''वफ़ादारी बँटी हुई थी। हालांकि मेरे अपने गाँव में लोग अफ़ग़ान सरकार का समर्थन कर रहे थे लेकिन वे लोग विकास के अभाव, गरीबी और बढ़ते भ्रष्टाचार की वजह से काफी दिग्भ्रमित थे।'' ओबैदुल्ला कहते हैं, ''उस वक्त तालिबान का प्रचार अपने चरम पर था और मैं भी उसका शिकार हो गया।''

ओबैदुल्ला के अनुसार, ''जब मैं पहली बार तालिबान विद्रोहियों से मिला तो मुझे लगा कि ये सुन्ना यानी मुहम्मद साहब के बताए मार्ग का अनुसरण करने वाले युवा लोग हैं। मैं जवान था और उनके बहकावे में आ गया।'' ओबैदुल्ला को एक तालिबान शिविर में ले जाया गया, हथियारों का प्रशिक्षण दिया गया और फिर अफगान-पाकिस्तान सीमा पर उसे लड़ने के लिए भेज दिया गया।

पकड़ो या मारो

युद्ध में उसके कौशल ने तालिबान नेताओं को काफी प्रभावित किया और तीन साल के भीतर ही वो तालिबान का सबसे युवा कमांडर बन गया। ओबैदुल्ला का कहना है कि उसने अफगान-पाकिस्तान सीमा पर दोनों ओर से लड़ाई की। वो बताता है, ''एक बार तो मैंने एक ही दिन में 12 पाकिस्तानी चौकियों पर धावा बोला था।'' हर सफल हमले के बाद ओबैदुल्ला तालिबान लोगों में खूब लोकप्रिय होने लगा।

ओबैदुल्ला का दावा है कि उसकी मुलाकात पाकिस्तान में तालिबान के प्रमुख हकीमुल्ला महसूद से भी हो चुकी है। ओबैदुल्ला का कहना है कि उसके अधीन करीब 250 लड़ाके काम करते थे। कुनार प्रांत के एक खुफिया अधिकारी के मुताबिक तालिबान में उसकी बढ़ती लोकप्रियता की वजह से वह नैटो की निगाह में भी आ गया और जल्द ही नैटो सेनाओं ने उसका नाम ''पकड़ो या मारो'' की सूची में शामिल कर लिया।

लेकिन ओबैदुल्ला का कहना है कि तालिबान ने साल 2010 में उसे बंदी बना लिया और तब वो अपने भविष्य को लेकर दिग्भ्रमित हो गया। ओबैदुल्ला के मुताबिक, ''तीन सालों में मैंने तालिबान के जिहाद को समझना शुरू किया। मुझे लगता था कि ये लोग इस्लाम के लिए लड़ रहे हैं, लेकिन मैं गलत था। वे या तो अपने लिए लड़ रहे थे या फिर पाकिस्तान के लिए।''

ओबैदुल्ला कहते हैं कि तालिबान को उसके साथ तब समस्या आने लगी, जब उसने अपने समूह में आत्मघाती हमलावरों को रखने से ये कहकर मना कर दिया कि ये ग़ैर-इस्लामी है। साल 2010 में तालिबान ने उसे 47 दिनों के लिए जेल भेज दिया। ओबैदुल्ला पर आरोप लगाया कि वो फिरौती वसूल रहा है और अफ़ग़ान खुफिया विभाग से मिला हुआ है। ओबैदुल्ला कहता है कि तालिबान का युद्ध अफगानिस्तान को नष्ट करने की शुरुआत भर थी।

बदलाव

आखिरकार अपने नौ सहायकों के साथ ओबैदुल्ला ने पाला बदलने का फ़ैसला किया। कई बार की पूछताछ के बाद अफगान अधिकारियों ने कुनार प्रांत के बारे में उसकी जानकारी पर भरोसा करना शुरू कर दिया। इसके अलावा उसकी तालिबान की आंतरिक कार्यप्रणाली की जानकारी ने भी अफगान अधिकारियों को उसे अपनी ओर करने को प्रेरित किया।

कुछ महीनों बाद ओबैदुल्ला को स्थानीय पुलिस का प्रमुख बना दिया गया और उसके अधीन साठ कर्मचारियों को तैनात किया गया। लेकिन इलाके में ओबैदुल्ला के बारे में मिली-जुली राय है। खास कुनार की श्रोनकारे घाटी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''हम सभी उससे डरे हैं। वो बहादुर था, क्रूर था और यदि वो कहता था कि मैं कुछ कर रहा हूं तो वो उसे करके रहता था।''

ओबैदुल्ला स्वीकार करता है कि उसने वरिष्ठ कबायली नेताओं और अमीर लोगों से धन उगाही की, लेकिन ये धन तालिबान के वरिष्ठ नेताओं के पास जाता था। हमारे इंटरव्यू के कुछ ही समय बाद अक्टूबर 2012 में ओबैदुल्ला को गिरफ्तार कर लिया गया। उस पर आरोप लगाया गया कि उसने दो साल पहले एक बड़े कबायली नेता को रिहा करने के एवज में 52 हज़ार डॉलर की फिरौती वसूली थी।

ओबैदुल्ला सीधे तौर पर इस आरोप को नकारता है, लेकिन वो अभी भी कुनार की असदाबाद जेल में है और सैन्य अदालत में अपने मामले की सुनवाई का इंतजार कर रहा है। यदि वह दोषी पाया जाता है तो उसे आजीवन कारावास या फिर मौत की सजा मिल सकती है। मुख्यधारा में उसका करियर बहुत ही कम समय के लिए था। लेकिन ओबैदुल्ला की बदली हुई वफादारी अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों की स्वाभाविक अस्थिरता का एक बड़ा उदाहरण है।

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