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एशिया के 'सबसे बदतर शिविर' और रोहिंग्या मुसलमान

बीबीसी हिंदी/जोना फिशर

Updated Thu, 13 Dec 2012 09:18 PM IST
Asia worst camp and Rohingya Muslims
पश्चिमी बर्मा में पिछले छह महीनों से जारी जातीय हिंसा की वजह से एक लाख से भी ज्यादा लोगों को अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है।
पीढ़ियों से अलग-अलग रह रहे रखाईन प्रांत के बौद्ध और रोहिंग्या मुसलमानों को बलपूर्वक विभाजित होने के लिए मजबूर होना पड़ा है। राजधानी में जगह-जगह सड़कों पर अवरोध खड़े किए गए हैं और हजारों रखाईन लोगों के घर नष्ट कर दिए गए हैं।

लेकिन इन सबके बावजूद जो सबसे खराब स्थिति में रह रहे हैं, वो हैं रोहिंग्या। बर्मा और बांग्लादेश दोनों ने ही उन्हें अपना नागरिक मानने से इंकार कर दिया है, इस वजह से वे शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हैं।

रखाईन प्रांत की राजधानी सित्वे के दक्षिण में मेबोन प्रायद्वीप पर इस भेदभाव को साफतौर पर देखा जा सकता है।

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान गठबंधन सेनाओं के लिए बेहतरीन स्थल रहा ये स्थान आज दो समुदायों का अलग-अलग शरणार्थी शिविर बना हुआ है।

करीब एक मील तक इन शिविरों में पूरी तरह से नस्ली आधार पर लोग बंटे हुए हैं। एक तरफ रोहिंग्या हैं तो दूसरी ओर रखाईन। शहर के मध्य भाग में अपेक्षाकृत कुछ छोटे शिविर भी हैं।

हरी-भरी घास पर सुव्यवस्थित तरीके से सऊदी अरब के झंडों के साथ पैंतीस टेंट लगे हुए हैं। यहां करीब चार सौ बौद्ध अक्टूबर से रह रहे हैं।

विस्थापित
फू मा गाई का घर जला दिया गया था और अब वो अपनी दो बेटियों के साथ यहां रह रही हैं। वो कहती हैं, “सरकार यहां हमारी देखभाल कर रही है। यहां हमें खाना, दवा और जरूरत की सभी चीजें मिल रही हैं।”

थोड़ी ही दूर पर मुझे बर्मा और संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी वो जगह दिखाते हैं जहां बड़ी मात्रा में दवाइयां रखी हुई हैं।
थोड़ी ही दूर पर रोहिंग्या लोगों का शिविर है। यहां अब केवल उनके घरों के अवशेष मात्र दिख रहे हैं।

छह हफ्ते पहले इन्हीं में से एक चहारदीवारी एक प्राइमरी स्कूल हुआ करती थी जहां खिन ला मे प्रमुख अध्यापिका हुआ करती थीं। वो कहती हैं, “रखाईन समुदाय के लोग चाकू लेकर आए और पत्थरों और डंडों से हमला बोल दिया।”

इस हमले की वजह से वो वहां से भाग गईं और उनके साथ करीब चार हजार रोहिंग्या लोग भी थे। ये सभी लोग शहर के बाहर एक छोटी सी जगह पर चले गए। इसी जगह पर रोहिंग्या लोगों का शिविर है।

सहायता कर्मियों ने मुझे बताया कि ये शिविर दुनिया भर के नहीं तो कम से कम एशिया के सबसे खराब शिविरों में से हैं।

मेबोन में दोनों शिविरों तक पहुंचने के लिए नावों का सहारा लेना पड़ता है और साफ-साफ और सामान पहुंचाने के तमाम रास्ते बंद हैं। रखाईन बौद्धों का उन रास्तों पर नियंत्रण है और सहायताकर्मी बिना उनकी इजाजत के नहीं जा सकते।

परेशानी
इस तरह की स्थिति रखाईन के दूसरे इलाकों में भी है। एक प्रमुख सहायता एजेंसी के अधिकारी ने मुझसे बताया कि बौद्ध समुदाय के लोगों द्वारा पहुंचाई जा रही बाधा के चलते हम नब्बे फीसदी काम नहीं कर पा रहे हैं। जब तक सेना दखल नहीं देती तब तक यहां सहायता सामग्री पहुंचाना नामुमकिन है।

बर्मा के सीमा मामलों के मंत्री थीन ह्ते ने हम लोगों के साथ मेबोन के इन दोनों शिविरों का दौरा किया और कहा कि सेना रोहिंग्या लोगों की सुरक्षा पर नजर रखे हुए है। उन्होंने कहा कि दोनों शिविरों में ये अंतर उनके आकार-प्रकार की वजह से है।

वो कहते हैं, “यहां कुछ स्थानीय लोग अव्यवस्था फैला रहे हैं। क्या आपके देश में हर समय सेना हस्तक्षेप करती है। बर्मा की सेना यहां शासन नहीं करती है। यहां सरकार है।”

रखाईन के शहरी इलाकों में स्थिति कुछ ठीक है। वहां स्थानीय अधिकारियों और सहायता कर्मियों के बीच रिश्ते अच्छे हुए हैं। जून महीने में यहां से जो लोग विस्थापित हुए थे, वो अब सही स्थिति में हैं।

रखाईन में सहायता कार्य के लिए और ज्यादा धन की जरूरत है। संयुक्त राष्ट्र की मानवीय सहायता की अधिकारी वेलेरी एमोस कहती हैं कि ये बर्मा के अधिकारियों के ऊपर है कि वो कड़ा कदम उठाएं।
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