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अरबों की दौलत पर बैठा है अफगानिस्तान!

Avanish Pathak

Avanish Pathak

Updated Mon, 24 Dec 2012 04:03 PM IST
afghanistan is sitting on billions wealth
लगभग 70-80 साल पहले की बात है जब अरब जगत को लोग मरूस्थल, रेत के टीलों पर दूर-दूर तक उड़ती धूल, ऊँटों के काफिलों और खजूरों के लिए जानते थे। लेकिन जब वहाँ तेल मिला तो रातों-रात बंजर भूमि के मालिक अरबपति हो गए। क्या अफगानिस्तान में भी कभी ऐसा ही होगा?
अफगानिस्तान के उत्तरी क्षेत्र में तीन अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा फर्मों को लाभप्रद तेल कंपनियों के तौर पर विकसित करने के लिए चुना गया है।

उम्मीद की जा रही है कि इस तरह के फैसले से अफगानिस्तान की विदेशी मदद पर निर्भरता कम होगी।

बीबीसी संवाददाताओं ने अफगानिस्तान के खनन का जायजा लिया और पाया कि इलाके में हाईड्रोकार्बन और खनिज पदार्थों के जो भंडार मिले हैं वो तकरीबन एक खरब डॉलर के हैं।

लेकिन विशेषज्ञों ने आगाह किया है कि यदि इस परियोजना की संधि और सुरक्षा कारकों के साथ जरा भी छेड़-छाड़ हुई तो मामला खटाई में पड़ सकता है।

घोरी सीमेंट कंपनी


1970 के दशक में उत्तरी अफगान के बग्हलान प्रांत की घोरी सीमेंट कंपनी अफगानिस्तान की सबसे सफल कंपनी रही। इसने 100 से ज्यादा लोगों को रोजगार मुहैया कराया और हजारों टन सीमेंट सोवियत संघ को निर्यात किया।

कंपनी के मैनेजर इस्लामुद्दीन अहमदी कहते हैं कि इस सीमेंट की मांग काफी ज्यादा है, लेकिन हम अच्छा परिणाम नहीं दे पाते क्योंकि हमारे पास बिजली आपूर्ति की समस्या है।

अहमदी कहते हैं, “संयंत्र को बिजली की आपूर्ति के लिए लाइमस्टोन और कोयला चाहिए और ये दोनों ही चीजें मौजूद हैं, लेकिन इसके लिए जरूरी है उर्जा के नए संयंत्र लगाने के और ये बहुत बड़ा सत्य है।”

घोरी कंपनी इस वक्त पूरे उत्तरी अफगानिस्तान को करीब 60 फीसदी सीमेंट मुहैया कराती है। व्यापारी मानते हैं कि ये सस्ता और बेहतर है और इसके विकल्प के नाम पर पाकिस्तान है।

लेकिन संयत्र अभी भी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रहा। मजदूरों को जो वेतन दिया जा रहा है वो भी काफी कम है और ये मजदूरों के बीच निराशा का बहुत बड़ा कारण है।

संयंत्र में काम करने वाले करीब 600 कर्मचारी अपनी तन्ख्वाह का रोना रोते हैं और इसे जीविकोपार्जन के लिए कमतर पाते हैं।

अहमदी कहते हैं, “गरीबों को तो यहां से कुछ हासिल नहीं हो रहा। लेकिन ये जरूर है कि इस संयंत्र से कई अन्य लोग मोटा पैसा बना रहे हैं।”

घोरी सीमेंट का 2006 में निजीकरण हुआ और इसके लिए जो संधि हुई वो काफी विवादास्पद थी।

इस बात के लिए खनन और उद्योग मंत्री वहीदुल्ला शरानी काफी आलोचनात्मक हो जाते हैं।

शरानी कहते हैं, “30 साल के इस सौदे में राष्ट्रपति हामिद करज़ई के भाई महमूद करज़ई ने सिर्फ चार पन्ने का दस्तावेज तैयार करवाया जो कि वित्तीय, कानूनी और तकनीकी खामियों से भरा था।”

महमूद करज़ई ने 2011 में अपने शेयर कंपनी मैनेजमेंट को बेच दिए और अब उनका कंपनी के साथ कोई संबंध नहीं रह गया। लेकिन बीबीसी को दिए एक साक्षात्कार में महमूद करजई अपनी आलोचना पर बिफर पड़ते हैं। वो कहते हैं, “सौदे के दस्तावेज की कॉपी कितनी लंबी है उससे ज्यादा महत्वपूर्ण ये है कि सौदे में कहा क्या गया है।”

करज़ई कहते हैं कि एक नया संयंत्र लगाने से बेहतर है कि कंपनी घोरी के भीतर जो दो ब्लॉक हैं उसकी देखरेख की जाए।

जबकि शरानी सरकार पर आरोप लगाते हैं कि सरकार ने घोरी कंपनी में सुधार और एक उर्जा संयंत्र लगाने के लिहाज से विदेशों से अत्यधिक कर्ज लिए। अफगानिस्तान सार्वजनिक और निजी भागीदारी में शून्य है।

अयंक तांबा खदान

काबुल के नज़दीक लोगर प्रांत के अयंक ताम्र खदान की संधि को लेकर भी सवाल उठे थे। अयंक अफगानिस्तान के सबसे बड़े खदानों में से एक है। कहा जाता है कि सन 2007 में चीन की कपंनी ‘मैटलर्जिकल समूह निगम’ को जमा खदान अनुबंध से सम्मानित किया गया था।

लेकिन समझौते का ब्यौरा अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है।

एक अभियान समूह की रिपोर्ट में बताया गया है कि इस समझौते में पारदर्शिता की कमी है जो कि एक गंभीर बात है।

रिपोर्ट को जानने वाले जुमन कुब्बा का कहना है, “हम सुन रहे हैं कि ये एक गोपनीय समझौता है। स्थानीय समुदाय के बीच इस तरह के समझौते पहले से ही ये अविश्वास की स्थिति पैदा करते हैं और ये स्थिति हिंसा का नेतृत्व कर सकते हैं। ये परियोजना की बहुत ही नकारात्मक बात है। "

हालांकि अफगान अधिकारी इसे लेकर काफी आश्वस्त दिखे हैं।

अधिकारी मानते हैं कि आने वाले समय में देश को इससे 400 मिलियन डॉलर का बड़ा फायदा हो सकता है, इससे हजारों रोजगार निकल सकते हैं।

चीन के साथ हुए समझौते में अफगानिस्तान में अच्छी सड़कें भी बनाने का वादा किया गया है।

लेकिन असलियत पर निगाह डालें तो इसके लिए लंबा रास्ता तय करना पड़ सकता है।

चीन अभी सर्वेक्षण कर रहा है। चीन को अभी सड़क बनानी होंगी और साथ ही रेलवे लाइन भी बिछानी होंगी।

जबकि यहां कदम-कदम पर बारुदी सुरंगों का खतरा है। खनन मंत्रालय ने अयंक के साथ एक समझौता किया है जिसके तहत अयंक तक जाने वाले रास्ते से बारुदी सुरंगों का हटाया जाएगा और इस काम में करीब 2 साल लगने की संभावना है। में

अमू रिवर बेसिन


चीन अफगानिस्तान के उत्तर में अमू रिवर बेसिन के संभावित तेल भंडार के विकास में भी शामिल है।

इसने एक लंबा सफर तय किया है। 1950 में राजा ज़ाहिर शाह ने इस क्षेत्र को खोला था।

परियोजना के तहत पहले तीन वर्षों के दौरान कच्चे तेल को विदेशों में परिष्कृत करने के लिए निर्यात किया जाएगा।

लेकिन इस समझौते के तहत एक तेल रिफाइनरी देश में भी बनाने का वायदा किया गया है।

चीन इलाके तक परिवहन की सुविधा भी उपलब्ध कराने के लिए बाध्य है।

इलाके के गवर्नर बीबीसी से कहते हैं, तेल से हमारी जीवन शैली बदलेगी। हम बिजली के लिए भी आशावादी हैं।

स्थानीय दुकानदार मोहम्मद हसन ने बीबीसी को बताया, “परियोजना से हमारे युवाओं को रोजगार मिलेगा।”

लेकिन अमू बेसिन का निजीकरण भी अयंक और घोरी संयंत्र की तरह सवालों के घेरे में है।

यहां भी टेंडर को लेकर तमाम तरह की आशंकाएं मौजूद हैं।

इस पर अफगान सरकार ने 2011 में एक समीक्षा कराई और फिर इसके रिपोर्ट में बताया कि समझौते में किसी तरह की धांधली नहीं हुई है।

मंत्री शरानी का कहना है कि अगले साल की शुरुआत में विजेताओं की घोषणा कर दी जाएगी।

1970 और 80 के दशक में अफगानिस्तान सोवियत मध्य एशिया को गैस मुहैया कराता था जिसके बदले में अफगानिस्तान को भोजन और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति की जाती थी।

शेबरगन शहर के पास एक छोटा सा गैस संयंत्र है जो पूरे जॉज़िआन प्रांत में लगभग 200 घरों के लिए बिजली की आपूर्ति करता है।

ख्वाजा तेजुद्दीन एक ऐसे भाग्यशाली व्यक्ति हैं जिनके अपने घर में गैस उपलब्ध है। उन्होंने बीबीसी को बताया।” हमें गैस के लिए परेशान नहीं होना पड़ता, हमें 18 से 19 घंटे तक गैस मिलता है और जाड़ों में24 घंटे। यह खाना पकाने के लिए अच्छी है। जब बिजली नहीं रहती तो हम घर को गर्म करने में उपयोग करते हैं।”

बहरहाल लोगों का उम्मीदें तो काफी है और शायद होनी भी चाहिए लेकिन गोपनीय समझौते इस तरह की खुशफहमी पर काफी हद तक अंकुश लगा देते हैं।

(बीबीसी के लिए अली यावर सालिमी, सोहराब सिरत, हबीब क़ूयोश, अब्दुल्ला स्टनकज़ी और वहीद मसूद की रिपोर्ट)

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