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विज्ञान की ख़ातिर जान पर खेले पांच जांबाज़

बीबीसी हिन्दी

Updated Sat, 27 Oct 2012 03:58 PM IST
person who dared their lives for science
इतिहास में आवाज़ की गति को भेद आगे निकलने वाले पहले इंसान बने फेलिक्स बॉमगार्टनर कहते हैं कि उनकी इस उड़ान का मुख्य मकसद वैज्ञानिक आंकडे इकट्ठा करना था।
बॉमगार्टनर की टीम ज़ोर देकर कहती हैं कि उनका मकसद अत्यधिक उंचाई पर काम करने वाला पैराशूट तैयार करना है जो कि ऐसी स्थिती में काम आ सके जब अंतरिक्ष यात्रियों को स्ट्रैटोस्फ़ेयर में यान छोड़ना पड़े।

विज्ञान की मदद करने के लिए लोगों द्वारा इस तरह के साहसिक कदम उठाने का लंबा इतिहास रहा है। पेश है पांच वो लोग जिन्होंने विज्ञान की मदद के लिए जान दांव पर लगा दी।

यूरी गगारिन
रूसी अंतरिक्ष यात्री यूरी गगारिन 12 अप्रैल 1961 में एक अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त इंसान बन गए जब उन्होंने अंतरिक्ष में कदम रखने वाले पहले इंसान होने का गौरव हासिल किया। यूरी ने असल मायनों में बलि का बकरा बनना स्वीकार किया।

यूरी ने पृथ्वी की कक्षा में 108 मिनट तक चक्कर लगाया। वो 203 मील की उंचाई पर गए और 27000 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार का सामना किया। इस उड़ान ने साबित किया कि इंसान गंभीर उड़ान, वायुमंडल में दौबारा लौटने और जीरो गुरुत्वाकर्षण वातावरण जैसी कठिन स्थितियों का सामना कर सकता है।

अंतरिक्ष विमान स्पूतनिक के साथ यूरी गगारिन ने मानव सहित अंतरिक्ष यात्राओं के युग की शुरुआत की। उस वक्त कोई ये नहीं जानता था कि जीरो गुरुत्वाकर्षण का मानव शरीर पर क्या असर होगा। माना जाता था कि जीरो गुरुत्वाकर्षण का सामना करने वाला इंसान अपाहिज भी हो सकता है।

1958 से 1975 तक बीबीसी के अंतरिक्ष संवाददाता रहे रेजिनल्ड टर्निल कहते हैं, “ये शुरु से ही निर्धारित किया गया था कि वो अंतरिक्ष विमान को संचालित नहीं करेगें, ये ज़मीन से ही संचालित किया जाना था।”

असल में यूरी गागरिन लगभग बेहोंश हो गए थे, बिलकुल अलग वजह से, उनका सर्विस मॉड्यूल उनके कैप्सयूल से अलग नहीं हो पाया और वो चक्कर काटने लगे। इस दौरान उनके स्पेस सूट का तापमान भी खतरनाक स्तर तक बढ़ गया था।

जॉन पॉल स्टैप्प
अमरीका की वायुसेना में चिकित्सा शोधकर्ता के तौर पर तैनात जॉन पॉल स्टैप्प ने रॉकेट से जुडे़ हुए स्लैज पर सवारी कर 1954 में विश्व के सबेस तेज़ जिवित इंसान होने का गौरव हासिल किया।

इस दौरान उन्होंने 1017 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार हासिल की। उन्होंने शुन्य से .45 बोर की गोली की तेज़ गति सिर्फ पांच सेकेंड में हासिल की और सिर्फ 1.4 सेकेंड में शुन्य की गति पर आ रुके। जब वो रुके तो उनके शरीर पर गुरुत्वाकर्षण के बल से 46.2 गुना ज्यादा बल पड़ा।

इस परिक्षण ने मानव क्षमताओं की सीमाओं का इम्तेहान लिया। इस मकसद से की कैसे इंसानों के लिए यातायात को सुरक्षित बनाया जाए। इस दौरान उनकी हड्डियां टूट गई और आंख का रैटीना अपनी जगह से हिल गया। लेकिन स्टैप्प ने अपने आप को 29 ऐसे रॉकेट परिक्षणों के लिए उपलब्ध करवाया।

इन परिक्षणों से हेलमेट का डिज़ाइन सुधारा गया, हाथ पैर के लिए क्या सुरक्षा होनी चाहिए, वो निर्धारित की गई और विमानों की सीटों को और सुरक्षित कैसे बनाया जाए ये भी निर्धारित किया गया। साथ ही कैसे सीट बैल्ट से शरीर पर पड़ने वाले अतिरिक्त दबाव को सहन किया जाए, ये सुनिश्चित किया गया।

स्टैप्प ने कारों में सीट बैल्ट लगाने के लिए अभियान भी चलाए और मांग की लड़ाकू विमानों में इस्तेमाल होने वाली सुरक्षा प्रणालियों के नागरिक विमानों में भी अपनाया जाए। अमरीकी वायुसेना की आधिकारिक वेबसाइट के अनुसार स्टैप्प को अमरीकी इतिहास में सबसे ऐतिहासिक मुहावरा देने का श्रेय भी दिया है।

एक बार स्टेप्प को अपने सहयोगी कैप्टन मर्फी की वजह से चोट का सामना करना पड़ा। इसका पता चलने के बाद स्टैप्प ने कहा, “जो भी ग़लत होना है वो होकर रहेगा” इसके बाद से इसे मर्फी के सिंद्धात के नाम से जाना गया।

कैप्टन स्कॉट
रॉबर्ट फेल्कन स्कॉट को ऐसे खोजी के तौर पर प्रचारित किया जाता है जो दक्षिणी ध्रुव के खिलाफ अपनी लड़ाई हार गए और अपन टीम को मौत की ओर लेकर बढ़े। लेकिन इतिहासकार डेविड विलसन कहते हैं कि उनके अभियान ने आधुनिक धुर्वीय विज्ञान की नींव रखी।

डेविड विल्सन एड्वर्ड विल्सन के पड़पौते हैं जोकि रॉबर्ट फेल्कन की टीम में प्रकृतिवादी थे। स्कॉट के बर्फ में जमें शरीर के अवशेशों के पास एक समुद्र किनारे पाया जाने वाला पेड़ बरामद हुआ जो दिखाता है कि अंटार्टिका और आस्ट्रेलिया जैसे महाद्वीप पुरातन युग में एक ही विशाल महाद्वीप का हिस्सा थे।

विल्सन के मुताबिक इस खोज ने हमारे ग्रह के बारे में हमारी सोच को बदल दिया। इसके अलावा स्कॉट ने एंप्रर पैंग्विन के अंडे भी इक्ठठे किए। इन अंड़ो ने उस सोच को बदल दिया जिसके तहत पहले माना जाता था कि अंड़ा उन विभिन्न क्रमिक विकास के चरणों से गुजरने के बाद बच्चे का रुप लेता है जिन चरणों से होते हुए वो नस्ल गुजरी है। वैज्ञानिकों को उम्मीद थी की ये अंडे डायनासोर और पक्षियों के बीच भी कोई संबध स्थापित करेगें लेकिन ऐसा नहीं हुआ।

डेन मार्टिन
डेन के एवरेस्ट पर ख़ून में ऑक्सिजन की मात्रा नापी। जब गहन देख रेख चिकित्सक डेन मार्टिन एवरेस्ट पर चढ़े तो उन्होंने मानव शरीर में मौजूद सबसे कम ऑक्सिजन का स्तर मापा वो भी अपने आप पर। देखने में भले ही ये उतना हिम्मती ना लगे, लेकिन वो डॉक्टरों की उस टीम का हिस्सा थे जो ये जानने की कोशिश कर रहे थे कि मानव शरीर में मौजूद कम ऑक्सिजन का मनाव शरीर पर क्या असर पड़ता है।

इस शोध का मकसद था कि गंभीर रुप से घायल हुए मरीज़ों में कम ऑक्सिजन के स्तर से कैसे निपटा जाए। डेन मार्टिन कहते हैं, “जब लोग गहन चिकित्सा यूनिट में होते हैं तो अक्सर उनके ख़ून में ऑक्सिजन की मात्रा सबसे कम होती है। कुछ लोग इसे झेल जाते हैं और कुछ इसे नहीं झेल पाते। हम इसके असर के बारे में कतई नहीं जानते थे।

डॉक्टरों की टीम ने पाया कि गहन चिकित्सा कक्ष में मरीज़ो को ज्यादा ऑक्सिजन देने से ज़रूरी नहीं है कि मरीज़ो की हालत में सुधार हो। डॉक्टरों ने पाया कि शेरपाओं के ख़ून में नाइट्रिक ऑक्साइड अधिक होता है और अब वो मरीज़ों के ख़ून में नाइट्रिक ऑक्साइड को मौजूदगी से संबधित शोध में लगे हुए है।

जार्ज हेडली स्टेनफोर्थ
रॉयल एयर फोर्स के पायलट रहे जार्ज हेडली स्टेनफोर्थ 28 सितंबर 1931 को विश्व के पहले ऐसे इंसान बने जिन्होंने 643 किलोमीटर प्रतिघंटे की रफ्तार से उड़ान भरी। श्नाइडर ट्रॉफी के लिए हुए मुकाबले में ये रिकार्ड तोड़ा गया।

इस उड़ान में इस्तेमाल किए गए सुपर मरीन विमान को आरजे मिशेल ने डिज़ाइन किया था। मिशेल के इस डिज़ाइन का इस्तेमाल सैफायर विमान बनाने में किया। सैफायर विमान रायल एयर फोर्स के लिए दूसरे विश्व युद्द में काफी महत्वपूर्ण साबित हुआ।

पायलट जॉन रसल कहते हैं कि जर्मनी को हराने के लिए श्नाइडर ट्रॉफी ज़रुरी थी, अगर उन्होंने विमान विद्या को इतना ना सुधारा होता तो उनके पास सैफायर जैसा विमान नहीं होता। इस इंजन के विकास में 18 साल का समय लगा।

फ्रांस के उद्योगपतियों द्वारा पैदा की गई प्रतिस्पर्धा को चलते 1913 से 1931 के बीच विमानन उद्योग का इतना विकास हुआ। स्टेनफोर्थ ने विमान को 12 मिनट तक उल्टा उड़ाने का भी विश्व रिकार्ड बनाया।
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