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क्या पोर्न ही है 'असली सेक्स'?

Santosh Trivedi

Santosh Trivedi

Updated Sat, 27 Oct 2012 03:35 PM IST
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बच्चों या किशोरों का पोर्न वेबसाइट देखना आजकल एक आम बात होती जा रही है। जिसके कई नुकसान हैं और उनके भीतर होने वाला सबसे बड़ा नुकसान है सेक्स को लेकर विकृत नज़रिया पैदा होना।
ये एक ऐसी समस्या है जो बड़े होते बच्चों के माता-पिता के लिए सिरदर्द बनती जा रही है। उन्हें ये समझ में नहीं आता कि वो कैसे, कितना और कब अपने बच्चों पर रोक लगाएं।

आज जबकि हर बच्चे के पास उसका निजी कंप्यूटर, इंटरनेट कनेक्शन और स्मार्टफोन मौजूद है तब उन पर इसका असर पड़ना स्वाभाविक है। इस बारे में कोई ठोस आँकडा़ भी मौजूद नहीं है जो ये बता सके कि कितने बच्चे इंटरनेट पर पोर्न देखते हैं।

साल 2011 में यूरोप में किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक नौ से 16 साल की उम्र के एक तिहाई बच्चों ने पोर्न तस्वीरें देख रखीं थी लेकिन उनमें से सिर्फ 11 प्रतिशत ऐसे थे जिन्होंने ये तस्वीरें वेबसाइट पर देखी थीं।

जबकि 'यू गॉव' द्वारा किए गए सर्वेक्षण के अनुसार 16-18 साल के बच्चों में से भी एक तिहाई ने पोर्न तस्वीरें मोबाइल फोन पर देखीं थी।

पाठ्यक्रम में पोर्न
ब्रिटेन का 'नेशनल एसोसिएशन ऑफ हेड टीचर्स' देश के पाठ्यक्रम में पोर्नोग्राफी के असर को शामिल करना चाहता है, ताकि बच्चों को 10 साल की उम्र से ही सेक्स के बारे में सकारात्मक जानकारी दी जा सके।

इसमें उन्हें असुरक्षित और विकृत सेक्स की पहचान करने और उससे बचने के बारे में बताया जाएगा। ऊँची क्लास के बच्चों के लिए पाठ्यक्रम को और विस्तृत करने का भी सुझाव है।

सेक्स शिक्षा से संबंधित कानून बनाने वाले सिओन ह्मफ्रेज़ के अनुसार, ''आजकल के बच्चे ऐसी दुनिया में रह रहे हैं जहाँ सेक्स एक खुला विषय है। ऐसे में ज़रूरी है कि उन्हें ये बताया जाए कि वो ऐसे हालात में किस तरह का व्यवहार करें।''

मु्ख्य मुद्दा ये है कि इन किशोर बच्चों की आगे की ज़िंदगी उनके आज के व्यवहार पर आधारित होगी। उन्हें ये समझाना बेहद ज़रुरी है कि पोर्न सामान्य या असल सेक्स-जीवन का हिस्सा नहीं है।

कई बार ये किशोर होते बच्चे उस तरह का व्यवहार करने के लिए मजबूर किए जाते हैं जो वो आमतौर पर नहीं करना चाहते और उन्हें ऐसा हम उम्र दोस्तों के दबाव के कारण करना पड़ता है।

जो चीज़ पोर्न वोबसाइट पर बार-बार दिखाई जाती है उसे ये बड़े होते बच्चे जिज्ञासावश करना चाहते हैं और उसे ही सही मान लेते हैं।

'प्लिमथ यूनिवर्सिटी' और यूके के 'सेफर इंटरनेट सेंटर' द्वारा 16-24 साल के युवाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण में एक तिहाई लोगों ने माना कि पोर्न से उनके आपसी संबंधों पर असर पड़ा है।

ब्रिटेन की चाइल्ड-लाइन संस्था के मुताबिक उनके पास यौन क्रिया से संबंधित तस्वीरें देखकर आने वाले डिस्ट्रेस्ड कॉल्स में 34 प्रतिशत का इज़ाफा हुआ है। लेकिन इनमें किसी भी निष्कर्ष को आखिरी नहीं माना जा सकता है।

करीब सात हज़ार छात्रों को सेक्स शिक्षा देने वाले वाली चैरिटी संस्था 'फैमिली लाइव्स' की लियोनी हॉज इस बात को मानती हैं कि बच्चों को सेक्स और पोर्न के फर्क के बारे में बताया जाए।

वो कहती हैं कि जब 90 प्रतिशत बच्चों के हाथ में स्मार्टफोन उपलब्ध है तब उन्हें ये बताने की ज़रूरत नहीं है कि एक बच्चे का जन्म कैसे होता है?

कैसे करें सामना
चैरिटी फैमिली लाइव्स का कहना है कि आजकल काफी कम उम्र के बच्चों को पोर्नोग्राफी उपलब्ध है, ऐसे में ये कहना कि वो इसका डटकर सामना नहीं कर सकते ये ग़लत होगा।

संस्था कई तरह के प्रयोग के ज़रिए इन बच्चों को बताती है कि अगर कभी उन्हें इस तरह की अश्लील तस्वीरें या प्रस्ताव भेजा जाए तो वो कैसे इसे अस्वीकार करें। हालांकि नेशनल यूनियन टीचर्स का मानना है कि पोर्नोग्राफी से संबंधित शिक्षा देना, काफी दूर निकल जाना है।

ऐसे परेशान किशोरों से बातचीत कर उनकी समस्याएं सुनने वालीं 52 साल की गैलोप कहती हैं, ''मेरे पास रोज़ाना ऐसे कई युवाओं के मेल आते हैं जो मुझसे पूछते हैं कि वो तय नहीं कर पाते कि क्या सही है या क्या ग़लत?''

गैलोप के मुताबिक इन बच्चों को यौन शिक्षा देने के अलावा माता-पिता का अपने बच्चों से इस विषय पर खुलकर बात करना भी बेहद ज़रुरी है।

वो कहती हैं, ''मूल बात ये है कि हमें शर्मिंदा नहीं होना चाहिए, ना ही ये कहना चाहिए कि ये अच्छी लड़कियों का काम नहीं। बच्चे इस विषय पर बात करना चाहें या नहीं हमें उन्हें इस बारे में जागरूक करते रहना चाहिए।''

क्योंकि आम तौर पर ये देखा गया है कि माँएं जब अपने बच्चों के कंप्यूटर पर पोर्न साइट खुला देखती हैं तो परेशान हो जाती हैं।

इन हालात में उन्हें समझ नहीं आता कि क्या करें और क्या नहीं। उदाहरण के लिए एक अकेली मां को किशोर बेटे को समझाना मुश्किल हो सकता है और अकेले पिता के लिए किशोर बेटी को समझाना थोड़ा चुनौतीपूर्ण।

कई घरों में तो सेक्स के बारे में बात करना भी परंपरा के खिलाफ़ होता है। ऐसे में सबसे कारगर तरीका वो होता है जहां स्कूल और अभिभावक दोनों मिलकर बच्चों को इस बारे जानकारी देते हैं।
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