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ओबामा: चुनौतियों और विरासत की जंग

बीबीसी हिंदी/एलिस कोसे

Updated Thu, 08 Nov 2012 03:14 PM IST
challeges and legacy for barack obama
अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा में वो बात है कि वो अगले चार सालों में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए उन्हें कमर कसनी होगी और प्रशासन पर जो़र देना होगा।
2008 में ओबामा के पहली बार राष्ट्रपति चुने जाने के बाद ही एक बात स्पष्ट हो गई थी कि पर्यवेक्षकों की नजर में वो जो विरासत छोड़ कर जाएंगे उसका असल उपलब्धियों से लेना देना नहीं होगा।

पहले चुनाव में जीत हासिल करके ही उन्होंने इस धारणा को धवस्त कर दिया था कि कुछ भी हासिल करने में रंग और नस्ल बाधा नहीं है- खा़सकर ऐसे देश में जहाँ कभी काले समुदाय को खेतों में फसल तोड़ने के अलावा किसी काम के काबिल नहीं समझा जाता था।

ओबामा केवल एक उम्मीदवार भर नहीं थे बल्कि उम्मीद की किरण थे। लेकिन पहले कार्यकाल में देश को चलाने की जो प्रक्रिया होती है और मंदी के भार ने मानो ओबामा को धरातल पर ला दिया।

सांकेतिक महत्व से आगे
जब वे दोबारा चुनाव अभियान में उतरे तो ओबामा चार साल तक शासन कर चुके थे। अपने कामकाज के रिकॉर्ड का उन्हें बचाव करना था, यही रिकॉर्ड विपक्ष के निशाने पर था।

2008 में उनकी उम्मीदवारी का खासा सांकेतिक महत्व भी था लेकिन 2012 में उनकी उम्मीदवारी नतीजों पर भी निर्भर थी। ओबामा ने पहली पारी में लोगों में कई उम्मीदें जगाई थीं और इन पर उन्हें परखा गया। लेकिन वे इन उम्मीदों पर पूरी तरह खरे नहीं उतर पाए।

अब ओबामा दोबारा चुनाव जीत चुके हैं। उनके पास चार और साल हैं ये दिखाने के लिए वो सामाजिक प्रगति के पोस्टर ब्वॉय मात्र नहीं है।

इस सब का मतलब ये नहीं है कि ओबामा के पहले कार्यकाल में कुछ ख़ास नहीं हुआ। उन्होंने स्वास्थ्य सेवा में अच्छा काम किया, ओसामा बिन लादेन को मारने के अभियान को मंज़ूरी दी और अमेरिका के ऑटोमोबाइल उद्योग को बचाया। उन्होंने आर्थिक मुसीबतों का भी अच्छे से सामना किया।

लेकिन ओबामा जो उपलब्धियों हासिल कर चुके हैं उससे से भी ज़्यादा दिलचस्प भविष्य के वो वादें हैं जिनका प्रतिनिधित्व वे करते हैं।

बदलना होगा रवैया
तूफान सैंडी के बाद न्यूयॉर्क के मेयर माइकल ब्लूमबर्ग भी ओबामा से प्रभावित हुए बगैर न रह सके। जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर ब्लूबर्ग ओबामा के साथ हो गए हैं। लेकिन ओबामा के पूरे चुनाव प्रचार के दौरान जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर कोई खास बात नहीं हुई थी।

अगर इस कार्यकाल में ओबामा वाकई खुद को सर्वश्रेष्ठ साबित करना चाहते है तो उन्हें जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर आवाज उठानी होगी और ऊर्जा मामलों पर ऐसी नीति बनानी होगी जिसका दूरगामी परिणाम हो।

वैसे तो रिपब्लिकन पार्टी के सदस्यों को लग रहा था कि ओबामा हार जाएंगे और पार्टी अर्थव्यवस्था पर अपनी नीतियां अपनाएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अब अगर ओबामा को अपनी बात मनवानी है तो इस साल के अंत में उन्हें बजट और करों को लेकर कड़े फैसले लेने पड़ सकते हैं।

कांग्रेस के सदस्यों को मनाने में उन्हें अपने आकर्षक व्यक्तित्व और दबदबे का इस्तेमाल करना होगा जबकि वे इससे हिचकते रहे हैं। दरअसल ओबामा के रवैये के साथ दिक्कत ये है कि वो इस इंतजा़र में है कि कांग्रेस में जारी गतिरोध शायद बाहर से आकर कोई ठीक कर देगा।

ओबामा के सामने चुनौती यही है कि वो इस धारणा को बदले। उन्हें राष्ट्रपति पद की सारी शक्तियों और अधिकारों को झोंक देना होगा।

कई हैं चुनौतियां
अमेरिका में अलग अलग नस्लों के लोग हैं और बहुसंस्कृतिवाद बढ़ रहा है। ओबामा के दोबारा चुने जाने में ये एक बड़ा कारण रहा है।

रिपब्लिकन पार्टी के मिट रोमनी को श्वेत वोटों का फायदा था लेकिन अमेरिका के बढ़ते नस्लीय मतदाताओं के कारण रोमनी को श्वेत वोटों को उतना फायदा नहीं हो सका।

जो भी अमेरिकी राजनेता दूरदर्शी सोच रखता है वो इस बदलती स्थिति को नजरअंदाज़ नहीं कर सकता। जाहिर है ओबामा को भी अप्रवासियों के मु्द्दों में सुधार पर और गंभीर होना पड़ेगा। इसके अलावा अमेरिका को ये भी मानना पड़ेगा कि आर्थिक और नस्लीय मतभेदों से निपटने में उसे बेहतर कदम उठाने होंगे।

व्हाइट हाउस की दौड़ में शिक्षा के क्षेत्र में कुछ सुधार हुए हैं लेकिन ये भी सच है कि गरीब अल्पसंख्यक लोग आज भी खराब स्कूलों में पढ़ते है। लोगों के बीच बढ़ती आर्थिक खाई को कैसे कम किया जाए इस पर ओबामा की स्पष्ट सोच सामने नहीं आई है। दूसरे कार्यकाल में ओबामा को इन मुद्दों पर ध्यान देना होगा।

अमेरिकी लोग इस बात को समझते हैं कि ओबामा का पहला कार्यकाल कोई पिकनिक नहीं थी, उन्हें विपक्ष के हमलों का सामना करना पड़ा। शायद इसीलिए लोग उन्हें दूसरा मौका देने को तैयार हुए। लेकिन अब लोग चाहते हैं कि ओबामा वादे पूरे करें।

ओबामा का असल टेस्ट यही होगा कि जैसे-जैसे उनके चुनाव का सांकेतिक महत्व कम होगा वे असल चुनौतियों पर कितना खरा उतर पाते हैं, अपना एजेंडा पूरा कर पाते हैं या नहीं और विरासत में क्या छोड़ कर जाते हैं।

(एलिस कोसे न्यूजवीक में पूर्व स्तंभकार हैं, 10 किताबें लिख चुके हैं जिसमें द एंड ऑफ एंगर शामिल है।)
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