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मेरे अल्फाज़

रिश्तों के भंवर में

akanskha pandey

17 कविताएं

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ये मेरा मन उदास सा क्यों है, सब के साथ हूं
मगर क्यों एक भ्रम जाल सा बन गया है
मैंने भी महसूस किया ये बदलाव है
क्यों मुझे कुछ समझ नहीं आता।

जितना सुलझा रही हूं ये उलझे हुऐ रिश्ते
उतना ही उलझते जा रहे हैं मेरे ये रिश्ते
किसी को छोड़ नहीं सकती, वो भी खास है
और ये रिश्ता भी खास है।

क्यूं मैं खुद खोती जा रही हूँ
मेरे लिये दोनो ही रिश्ते जज्बातों से जुड़े हैं
एक को भी खो दिया तो जी नहीं पाएंगे।

रिश्तों में कैद मेरी ज़िंदगी है
खुल कर जीना चाहती हूं ज़िन्दगी अपनी
मगर दिल की बेचैनी ने परेशान कर रखा है
रिश्तों में खुद को उलझा रखा है।

- उपासना पाण्डेय
  हरदोई, उत्तर प्रदेश

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