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राहत कैंप छोड़ कर कहां जाए आपदा के मारे

Uttar Kashi

Updated Mon, 10 Dec 2012 05:30 AM IST
उत्तरकाशी। आपदा में घर बार गंवाने वाले प्रभावितों का राहत शिविर में रहना सरकारी मशीनरी को गंवारा नहीं हो रहा है। नाकाफी राहत राशि के कारण ठौर-ठिकाना बना पाने में असमर्थ प्रभावितों को गंगोरी राहत शिविर से हटाने की तैयारी की जा रही है। जल विद्युत निगम का नोटिस प्रशासन को मिल गया है, जिस पर प्रशासन आगे की कार्रवाई की तैयारी में जुट गई है। इस राहत शिविर में रह रहे 20 परिवारों की स्थिति ऐसी है, कि जितनी राहत राशि उन्हें मिली है, उसके अनुसार, वह अपना नया घर खड़ा करने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में सवाल ये ही उठता है कि राहत शिविर छोड़कर आपदा के मारे ये लोग जाएं, तो कहां जाएं।
अगस्त में असी गंगा व भागीरथी में बाढ़ में मची तबाही को चार माह बीत चुके हैं। सरकार व प्रशासन की मानें तो सभी आपदा प्रभावितों को मानकों के अनुसार पूरी राहत राशि दी जा चुकी है। ये बात अलग है कि इस नाकाफी राहत राशि से मकान बनाना तो दूर जमीन तक मिल पाना मुश्किल है। फिर भी, 13 राहत शिविरों में आसरा पाए अधिकांश प्रभावित अपने टूटे-फूटे ठिकानों पर लौट चुके हैं। मगर 20 बेघरबार परिवार अब भी गंगोरी स्थित जल विद्युत निगम की कालोनी में रह रहे हैं। हालांकि यहां सुविधाओं के अभाव में उन्हें बेहद बुरी स्थिति में रहना पड़ रहा है। इस कालोनी में न तो बिजली-पानी की व्यवस्था है और न ही शौचालय या स्नानागार की।


आंकड़ों में नुकसान की तस्वीर
अगस्त की आपदा में भटवाड़ी प्रखंड में ही 84 भवन पूर्ण, 61 तीक्ष्ण और 79 आंशिक क्षतिग्रस्त हुए। सात कच्चे मकान भी आपदा की भेंट चढ़े। राहत शिविरों में करीब डेढ़ हजार परिवारों को रखा गया था।


इतनी राहत से क्या होगा
आपदा में ध्वस्त मकानों को एक-एक इकाई मानक कर केंद्रीय मानकों के अनुरूप सहायता दी गई है। मुख्यमंत्री राहत कोष से पूर्ण क्षतिग्रस्त को 2-2 लाख, तीक्ष्ण क्षतिग्रस्त को 50-50 हजार और आंशिक क्षतिग्रस्त को 19-19 सौ रुपये गृह अनुदान दिया गया। साथ में 5400 रुपये अहेतुक सहायता तथा कुछ परिवारों को दो हजार रुपये की दर से छह माह का किराया दिया गया।


कोट---
सभी प्रभावितों को राहत राशि का वितरण किया जा चुका है। करीब बीस परिवार अब भी गंगोरी निगम कालोनी में डेरा डाले हुए हैं। निगम ने कालोनी खाली कराने के लिए पत्र लिखा है। इस पर कार्रवाई की जाएगी।-डा.एसके.बरनवाल, प्रभारी अधिकारी जिला कार्यालय

बाढ़ में मकान, खेती की जमीन, घराट सब बह गया। सरकार द्वारा दी गई राहत ऊंट के मुंह में जीरा जैसी है। इसमें मकान बनना तो दूर जमीन तक नहीं मिल रही। ऐसे में सर्दियों में परिवार को लेकर कहां जाएं? निगम कालोनी में सिर छिपाना मजबूरी है।-केशर सिंह पंवार, बाढ़ प्रभावित गंगोरी।

अलग-अलग परिवार होने के बावजूद एक ही परिवार को राहत सहायता दी गई। इस राहत से दुबारा मकान बनना मुश्किल है। सरकार ने छह माह का किराया दिया है। पर इसके बाद हम कहां जाएंगे। विनोद अग्रवाल, बाढ़ प्रभावित गंगोरी।

केंद्रीय मानकों के अनुरूप राहत राशि का वितरण हो चुका है, लेकिन यह क्षति के लिहाज से काफी कम है। केंद्र सरकार से आपदा प्रभावितों के लिए विशेष पैकेज की मांग की जा रही है। स्वीकृति मिलने पर समुचित राहत प्रभावितों में बांटी जाएगी।-विजयपाल सजवाण, संसदीय सचिव गंगोत्री विधायक।

वर्ष 1991 के भूकंप के समय राहत वितरण में एक छत के नीचे रहने वाले परिवारों को इकाई माना गया। वर्ष 2003 के वरुणावत भूस्खलन के समय भी वास्तविक क्षति का मूल्यांकन कर राहत बांटी गई। अगस्त की बाढ़ से प्रभावित परिवारों को भी उनकी क्षति के अनुसार राहत दी जानी चाहिए।-गोपाल रावत, पूर्व विधायक गंगोत्री।

आंदोलन की तैयारी में बाढ़ प्रभावित
आपदा को काफी समय बीतने के बाद भी समुचित राहत और पुनर्वास तथा सुरक्षा कार्य न होने से गंगोरी के आपदा प्रभावितों में रोष पनप रहा है। आपदा प्रभावितों ने क्षतिग्रस्त मकानों में रह रहे परिवारों को इकाई मानकर राहत वितरण आदि मांगों को लेकर 16 दिसंबर से गंगोरी में आंदोलन शुरू करने का निर्णय लिया है। बैठक में केशर सिंह पंवार, अंकित उप्पल, सज्जन सिंह, विनोद अग्रवाल, परवेज खान, संतोषी राणा, विमला देवी, भगवान सिंह आदि दर्जनों बाढ़ पीड़ित मौजूद थे।
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