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भूकंप से फिर हिला उत्तरकाशी, कोई जनहानि नहीं

Uttar Kashi

Updated Wed, 28 Nov 2012 12:00 PM IST
उत्तरकाशी। प्राकृतिक आपदाओं के लिहाज से बेहद संवेदनशील उत्तरकाशी जनपद के लोग अभी अगस्त की बाढ़ की त्रासदी से उभर भी नहीं पाए कि मंगलवार शाम भूकंप के तेज झटके ने फिर दहशत फैला दी। इस झटके ने लोगों के जेहन में वर्ष 1991 के विनाशकारी भूकंप की याद ताजा करा दी। कई बार की आपदाओं से दो-चार होते रहे उत्तरकाशी के लोगों की जीवटता ही है कि वे इसके बावजूद आगे बढ़ते रहे।
इतिहास पर नजर डालें तो उत्तरकाशी आपदाओं का घर बन गया है। उन्नसवीं सदी के प्रारंभ में 1918 में पहले बड़े भूकंप ने पूरे क्षेत्र में तबाही मचा दी थी। पिछले चालीस वर्षों पर ही नजर डालें तो यहां आठ अगस्त 1978 की बाढ़ भागीरथी के तटों को तोड़ती-फोड़ती हुई आगे निकली। उसने तब तबाही के जो चिह्न छोड़े थे, वह अब भी जहां-तहां दिखते हैं। 1980 में ज्ञानसू गदेरे में बादल फटने की तबाही से 26 लोग काल-कवलित हुए थे। बावजूद उत्तरकाशी आगे बढ़ रहा था कि 1991 के भूकंप ने फिर उसकी प्रगति के रास्ते में अडंगा लगा दिया। तब आठ सौ से अधिक लोग भूकंप में मारे गए थे। जबकि सैकड़ों परिवार बेघर हो गए थे। 1999 के भूकंप ने फिर उत्तरकाशी को डराया। इसके बाद भी जिले में समय-समय पर भूकंप के झटके महसूस किए जाते रहे, लेकिन बड़ी तबाही का कारण नहीं बने। भूगर्भीय दृष्टि से जिला बेहद संवेदनशील जोन-4 व 5 में स्थित है।
बीच के वर्षों में छोटी तबाहियों को नजर अंदाज भी करें तो 2003 के वरुणावत भूस्खलन और पिछले वर्ष अगस्त में ही असी गंगा और भागीरथी की बाढ़ ने फिर चेतावनी दी। अभी उससे उभर कर जीवन संघर्ष को सुख के रास्ते पर बढ़ा ही रहे थे कि मंगलवार के भूकंप ने फिर झटका दिया। यह दीगर बात है कि इससे कोई जनहानि की सूचना अब तक नहीं है। हालांकि कई घरों में दरारें आने से लोग फिर दहशत के साये में हैं। ऐसे में आपदाओं के कारणों की तह में जाने की जरूरत है। इसके लिए भू-वैज्ञानिकों से लेकर समाज विज्ञानियों को भी चिंतन करना होगा। इसके साथ ही कमोबेश हर साल बरसात के मौसम में गाड-गदेरों में बादल फटने, अतिवृष्टि, भूस्खलन के चलते अगस्त व सितंबर के महीने तो जिले में आपदा के महीने ही माने जाते हैं।

इनसेट-

विकास तो तेज हुआ, लेकिन प्लानिंग नहीं बनी
उत्तरकाशी में जब भी तबाही हुई लगा अब तो विकास पर ब्रेक ही लग गया। बावजूद विकास यात्रा रुकी नहीं। हर त्रासदी के बाद तेजी से विकास हुआ। यह दीगर बात है कि सरकारी स्तर पर आपदाओं के जख्मों पर मरहम लगाने के लिए कोई ठोस योजना नहीं बनी। 1978 में बाड़ागड़ी को जोड़ने वाला दंडी क्षेत्र के समीप बना पुल फिर नहीं बन सका। भूकंप में ढहे कई भवन अब भी बताते हैं कि वहां कभी बुलंद इमारतें थीं। वरुणावत भूस्खलन को पूरी तरह नहीं रोका जा सका है। थोड़ी सी बरसात में भी गंगोत्री मार्ग कीचड़ से सन जाता है। बावजूद इसके पालिका ने इस मार्ग पर पालिका बाजार विकसित कर दिया। पिछले वर्ष अगस्त की बाढ़ से हुई तबाही देखें तो अब तक प्रांरभिक स्तर पर भी सुविधाएं नहीं मिल पाई हैं। जोशियाड़ा को जोड़ने के लिए अब तक वैकल्पिक पुलिया तक तैयार करना तो दूर झूला पुल का मलब तक नहीं हटाया जा सका। उत्तरकाशी जन मंच देहरादून के अध्यक्ष दुर्गा प्रसाद नौटियाल का कहना है कि आपदाओं की दृष्टि से संवेदनशील उत्तरकाशी के लिए महायोजना तैयार करने की जरूरत है। समाजिक कार्यकर्ता केपी भट्ट का कहना है कि अगर केवल उत्तरकाशी नगर की ही बात करें तो नगर में हो रहे बेतरतीब निर्माण कार्य भी भविष्य में तबाही का कारण बन सकते हैं। लेकिन इस दिशा में कोई सोच नहीं रहा है। शहर में खुले स्थान कम होते जा रहे हैं। ऐसे में मंगलवार को आया भूकंप अगर यह और अधिक तीव्रता का होता तो कई जानें केवल अफरा-तफरी में ही चली जाती। यह तो शुक्र है कि भूकंप की तीव्रता कम थी और कोई जन हानि नहीं हुई।


तीन वर्षों में महसूस किए गए भूकंप के बड़े झटके
तिथि रिक्टर स्केल पर तीव्रता
21 सितंबर 2009 4.7
4 अप्रैल 2011 5.7
20 जून 2011 4.6
10 फरवरी 2012 5

मुख्य आपदाएं
- आठ अगस्त 1978 में कनोडिया गाड में बनी झील से आई बाढ़
- 1980 में बादल फटने से ज्ञानसू गदेरे में हुई तबाही
- 20 अक्तूबर 1991 की रात को भूकंप
- 1999 में दोबारा आया भूकंप
- 2003 में वरुणावत भूस्खलन
- 2011 में असी गंगा और भागीरथी की बाढ़
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