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आसान नहीं है परियोजनाओं की राह

Uttar Kashi

Updated Fri, 21 Sep 2012 12:00 PM IST
उत्तरकाशी। बाढ़ में तबाह हुईं निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित जल विद्युत परियोजनाओं को दिसंबर 2014 तक तैयार करने कर फरमान तो जारी कर दिया गया, लेकिन हालात बेहद विकट हैं। इन परियोजनाओं को तबाही का कारण मान रहे लोग इस फैसले को लेकर नाराज हैं। साथ ही बाढ़ से असी गंगा घाटी का भूगोल इस कदर बदल गया है कि इन परियोजनाओं का निर्माण अब आसान नहीं है।
असी गंगा पर जल विद्युत निगम द्वारा 9 मेगावाट की काल्दीगाड, 4.5-4.5 मेगावाट की असी गंगा प्रथम व द्वितीय चरण परियोजना निर्माणाधीन तथा 9 मेगावाट की असी गंगा तृतीय चरण परियोजना प्रस्तावित थी। लगभग तैयार हो चुकी असी गंगा प्रथम का तो राज्य स्थापना दिवस पर 9 नवंबर को उद्घाटन होना था। लेकिन पहले 24 जुलाई और फिर 3 अगस्त की रात बाढ़ ने सब कुछ तबाह कर दिया। निगम ने निर्माणाधीन तीन परियोजनाओं में करीब 30 करोड़ की क्षति का आंकलन किया है।
परियोजनाओं के अलावा संगमचट्टी से लेकर उत्तरकाशी तक मची तबाही किसी से छिपी नहीं है। जानकार इन परियोजनाओं के लिए जंगलों के कटान, निर्माण में भारी विस्फोटकों के प्रयोग से पहाड़ियों के जर्जर होने तथा सारा मलबा नदी किनारे उड़ेले जाने को तबाही के लिए जिम्मेदार मान रहे हैं। ऐसे में इन परियोजनाओं को शुरू करने का निर्णय लोगों के गले नहीं उतर रहा है। इसके अलावा 5 से 10 मीटर तक उठ चुका असी गंगा का तल भी तकनीकी अड़चनें बढ़ा सकता है।

निर्माणाधीन एवं प्रस्तावित परियोजनाएं शीघ्र तैयार करने के निर्देश मिले हैं। असी गंगा तृतीय चरण परियोजना को लेकर ग्रामीणों के विरोध से प्रबंधन को अवगत कराया गया है। आपदा में असी गंगा की परियोजनाओं को 30 करोड़ का नुकसान हुआ है। -बीडी भट्ट, ईई, लघु जल विद्युत निगम

सुरक्षा की लिखित गारंटी दे निगम
उत्तरकाशी। परियोजनाओं की गड़बड़ियों को लेकर विरोध दर्ज कराते रहे क्षेत्र के जिला पंचायत सदस्य कमल सिंह रावत का कहना है कि निर्माण दुबारा शुरू करने से पहले निगम को क्षेत्र के लोगों की जान माल की सुरक्षा की लिखित गारंटी देनी होगी। क्षेत्र की जनता परियोजनाओं के लिए अपने बचे हुए खेत, मकान व जान गवांने को तैयार नहीं।

परियोजनाएं बनी तबाही का प्रमुख कारण
उत्तरकाशी। नदी बचाओ एवं रक्षासूत्र आंदोलन के प्रमुख सुरेश भाई का कहना है कि असी गंगा के उद्गम क्षेत्र की ढालदार पहाड़ियां भारी विस्फोटों से हिल चुकी हैं। इस बार असी गंगा घाटी में मची तबाही के पीछे परियोजनाएं ही बड़ा कारण थीं। अब यदि यहां दुबारा परियोजनाएं बनीं और फिर कभी बादल फटने की घटना हुई तो तबाही अनुमान से कहीं अधिक होगी।
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