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कभी पक्के घरों में रहते थे, अब झोपड़ी में

Uttar Kashi

Updated Thu, 06 Sep 2012 12:00 PM IST
केस- एक
खेतों में सब्जी पैदा कर पति की मौत के बाद चीवां गांव की बीना देवी अपने एक लड़के और चार लड़कियों की परवरिश कर रही थी। इसी आय से वह जूनियर से लेकर स्नातक की पढ़ाई कर रहे बच्चों का खर्चा उठाती थी। तीन अगस्त की बाढ़ में उनके सारे खेत बह गए। मकान खतरे की जद में आ गया। अब वह अपने पांचों बच्चों को लेकर सड़क के ऊपर एक पुराने बने टीन शेड में रह रही है। उसके पास बच्चों की पढ़ाई जारी रखने तथा पेट पालने का कोई सहारा नहीं बचा है। उन्हें सरकारी सहायता के नाम पर तिरपाल तक नहीं मिला।

केस- दो
रवाड़ा बस्ती में पुश्तैनी खेती की जमीन, दो मकान, गोशाला गंवा कर सतवीर और उसकी पत्नी शैला अपने पांच माह के दुधमुंहे बच्चे सहित चार बच्चों के साथ जंगल में तैयार झोंपड़ी में गुजारा कर रहे हैं। बाढ़ वाली रात को वे किसी तरह जंगल में पहुंच गए थे। तब से यहीं रह रही है। उसके सास-ससुर और दो देवर भी अलग झोंपड़ी बनाकर जंगल में ही रह रहे हैं। इस संयुक्त परिवार को गृह अनुदान तथा मुख्यमंत्री सहायता कोष से पैसा तो मिला, लेकिन इससे यह परिवार कैसे फिर उजड़े कुनबे को कहां बसाए, इसकी चिंता सता रही है।

उत्तरकाशी। बाढ़ से खेत और मकान गवां चुके चीवां, रवाड़ा और घटुसौड़ गंगोरी के कई परिवार जंगलों में झोंपड़ी डालकर रहने को मजबूर हैं। बेसहारा हुए कई परिवारों को तो सरकारी सहायता के नाम पर तिरपाल तक नहीं मिला। अपने दुधमुंहे बच्चों को लेकर जंगल में बरसाती और कंबलों से बनी झोपड़ी में रहने के सिवाय उनके पास कोई विकल्प नहीं है। जिन परिवारों को पैसा मिला भी, वह इतना कम है कि उससे न घर बन सकता है और न जमीन खरीदी जा सकती है।
बीना और सतवीर का परिवार को उदाहरण मात्र हैं। बाढ़ से कई परिवार बेघर हो गए हैं। महावीर और सूरजमणी की भी यही स्थिति है। इनके गंगोरी घटुसौड़ में असी गंगा की बाढ़ में मकान, गोशाला ही नहीं बल्कि घर के आसपास के सभी छह खेत बह गए। परिवार को लेकर ये दोनों सड़क के ऊपर गांव वालों के एक घर में शरण लिए हुए हैं। इन्हें दो-दो लाख गृह अनुदान तो मिला, लेकिन जमीन का संटवारा कर गंगोरी में जमीन ली थी, उसके बहने से अब मकान बनाने के लिए कहीं जमीन ही नहीं बची है। उनकी समझ में नहीं आ रहा है कि सिर छिपाने का इंतजाम कहां और कैसे करें।

रवाड़ा, चीवां तथा घटुसौड़ गंगोरी में कई परिवारों के सामने सिर छिपाने के लिए घर तथा आजीविका के साधनों की समस्या है। प्रभावितों को घर और खेत के बदले कहीं जमीन मिले तो प्रभावितों को नई जिंदगी मिल जाएगी।- अतर सिंह पंवार, प्रधान नाल्ड
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