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बीमारी की जड़ तक जाइए तभी इलाज मुमकिन

Uttar Kashi

Updated Wed, 15 Aug 2012 12:00 PM IST
उत्तरकाशी। आपदा प्रभावित असी गंगा और भागीरथी के खुले घावों के उपचार की योजनाएं बनने लगी हैं लेकिन एक बार फिर बीमारी की जड़ तक पहुंचने की कोशिश नहीं की जा रही। जब तक वहां तक नहीं पहुंचा जाएगा तब तक उत्तरकाशी जैसी आपदाओं से भारी नुकसान से निजात नहीं मिलेगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि भागीरथी और असी गंगा के बाढ़ से तबाह तटों को बांध जैसी तकनीकी से बांधे बिना उत्तरकाशी को बचाना मुश्किल है। यहां कई बड़े टापू मिट गए तो कई नए अस्तित्व में आ गए। इससे भागीरथी की धारा की दिशा ही बदल गई। दोनों नदियों के बदले भूगोल तथा कई किमी उधड़ी पड़ी तटवर्ती जमीन की स्थिति को लोग बरसात में जानमाल की एक और तबाही के रूप में देख रहे हैं।
शुक्रवार तीन अगस्त की बाढ़ ने उत्तरकाशी के बाशिंदों को हलाकान करके रख दिया। मीलों तक असी और भागीरथी के तट बाढ़ में बहकर टिहरी झील तक पहुंच गए। क्षेत्र के जागरूक लोगों ने बीते हफ्ते उत्तरकाशी के दौरे पर आए मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को इस बात से अवगत भी कराया था कि उत्तरकाशी को बचाने के लिए तटों को बांध जैसी तकनीकी से आरसीसी वाल से बांधा जाए। वर्ष 1978 की प्रलयंकारी बाढ़ के बाद उत्तरकाशी के तटवर्ती क्षेत्र को बचाने के लिए बने आरसीसी ब्लाक तथा रिटेनिंग वॉल का कमाल रहा है कि जोशियाड़ा तथा नगर में जानमाल का ज्यादा नुकसान नहीं हो पाया।

नदी के दोनों ओर हो तटबंधों का निर्माण
13 सितंबर 1970 को रानू की गाड गेंवला में आई बाढ़ में परिवार के सात सदस्यों को गंवाकर जोशियाड़ा में अपना नया आशियाना और व्यावसायिक प्रतिष्ठान खड़ा करने वाले मशहूर कवि पद्मश्री लीलाधर जगूड़ी फिर विस्थापित होने की कगार पर खड़े हैं। उनके घर का बड़ा हिस्सा इस बार की बाढ़ में भी बह गया। वह कहते हैं कि उत्तरकाशी को बचाना है कि बांध जैसी तकनीकी से इसके दोनों ओर के तटबंध बनने चाहिए। आरसीसी ब्लाक 2 मीटर मोटे हों और इसके ऊपर से भागीरथी के दोनों ओर मैरीन ड्राइव बने तो यह पर्यटन की दृष्टि से भी उपयोगी होगा। इससे तांबाखानी का कटाव भी बचेगा और शहर भी।

रीवर बेड से गहरी बुनियाद जरूरी
मनेरी भाली परियोजना में 18 साल तक उत्तरकाशी में सेवाएं दे चुके सिविल इंजीनियर विनोदानंद झा भी भागीरथी की फितरत से परिचित हैं। वे कहते हैं कि इस नदी की ‘स्कबर डेप्थ’ 7 से 10 फीट है। इसे नदी का मूल बेड भी कहा जाता है। इससे गहरे में बुनियाद डालकर यदि तटबंध तथा आरसीसी दीवार लगे तो यह बाढ़ के वेग को आसानी से सह लेती है। बांध भी इसी तकनीकी से बनते हैं।
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