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जुटने लगे तबाही के तमाशबीन भी

Uttar Kashi

Updated Sat, 11 Aug 2012 12:00 PM IST

बादल से घिर के आई फैले जहरीले साये
ऐसा तो देखा पहले बार। कंबल, आटा, पैसा आया
आश्वासन भी आए ंमन मकान के अंदर बर्फीले कोड़े बरसाये
कुछ हो आए दूर गांव तक, कुछ ने नापी सड़कें
कुछ ने अपने वोट तलाशे, बिखरी लाशों पर
कंबल तो कम बंटवाए, ज्यादा फोटो खिंचवाए
ऐसा तो देखा पहली बार।’ जन कवि डा. अतुल शर्मा
1991 के उत्तरकाशी भूकंप के दौरान लिखी गई यह कविता एक बार फिर हूबहू सामने दिखाई दे रही है। तब भूकंप से उत्तरकाशी की धरती दहली थी, इस बार बाढ़ की विभीषिका से। मंजर करीब वैसा ही है। गीत की प्रासंगिकता भी वैसी ही है। जहां देश के कई शहरों से स्वयंसेवी संगठन मदद को हाथ बढ़ाने आगे आए हैं, वहीं तमाशबीनों की भी कमी नहीं है। इस बार तो मोबाइल से इस विभीषिका को एक तरह से फिल्माने की होड़ सी लगी है। जाहिर है कि ऐसे से राहत कार्य प्रभावित हो रहे हैं।

उत्तरकाशी। महाराष्ट्र से आए व्हाइट आर्मी के 23 स्वयं सेवी गंगोरी पहुंचते ही नदी किनारे शवाें की तलाश सहित अन्य राहत कार्यों में हाथ बंटाने में जुट गए हैं। कई अन्य संगठनों के कार्यकर्ता भी आपदा प्रभावित क्षेत्रों तक पहुंचकर मदद पहुंचाने में लगे हैं। लेकिन तमाशबीनों की एक बड़ी जमात मदद के लिए हाथ बढ़ाने के बजाय सिर्फ भीड़ बढ़ा रही है। जिससे राहत कार्य प्रभावित हो रहे हैं। परिवार सहित सज संवर कर आपदा में मची तबाही का नजारा करने पहुंच रहे लोग पीड़ितों को चिढ़ाते से नजर आ रहे हैं। इस समय गंगोरी में सड़क, पेयजल, दूरसंचार, विद्युत आदि तमाम व्यवस्थाएं बहाल करने के प्रयास किए जा रहे हैं। ऐसे में ड्यूटी पर तैनात पुलिस कर्मियों का अधिकांश समय इन तमाशबीनों को नियंत्रित करने में ही जाया हो रहा है।
आंकड़ों में तो पर्याप्त रसद है
उत्तरकाशी। सरकारी आंकड़े गंगोत्री घाटी के झाला गोदाम में 527 कुंतल चावल, 255 कुंतल गेहूं तथा 77 कुंतल चीनी की उपलब्धता बता रहे हैं। जिन्हें जरूरत पड़ने पर प्रभावितों को बांटा जाएगा। प्रशासन बीते रोज ही हर्षिल में हेलीकाप्टर से राहत सामग्री के 30 पैकेट उतारकर प्रभावितों को बांटने की बात कह रहा है।
नहीं है सामान
उत्तरकाशी। हर्षिल निवासी डा.नागेंद्र सिंह रावत ने बताया कि यह राहत सामग्री हेलीपैड के बगल वाले बगोरी गांव तक नहीं बंटी। रसद के आंकड़े सरकारी स्टाक पंजिका में हो सकते हैं, लेकिन जरूरतमंदों के लिए सरकारी तो क्या प्राइवेट दुकानों में भी चावल नहीं है।
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