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आवास विकास का पता नहीं, अध्यक्ष पर लाखों खर्च

Udham singh nagar

Updated Wed, 19 Dec 2012 05:30 AM IST
रुद्रपुर। अगर कहें, प्रदेश सरकार ही सरकारी कृषि भूमि को खुर्द-बुर्द करने पर आमादा है तो अतिश्योक्ति नहीं होगी, क्योंकि पिछले ग्यारह वर्षों में प्रदेश में तीन बार सरकारें बदलीं। सभी ने अपने चहेतों का उत्तराखंड आवास-विकास परिषद के अध्यक्ष पद पर ताजपोशी की। मगर इस परिषद के पूर्णरूप से अस्तित्व में न आने से कृषि भूमि का खुर्द-बुर्द होना जारी है और कृषि भूमि पर आवासीय कालोनी के विकास की जिम्मेदारी निजी कंपनियों को दी जा रही है।
राज्य बनने से पहले उत्तर-प्रदेश आवास-विकास परिषद यहां पर जमीनों का अधिग्रहण करता था और आवासीय कालोनियां विकसित करके नीलामी के जरिए प्लाटों व भवनों की बिक्री करता था। यह सिलसिला उत्तराखंड बनने के बाद भी जारी रहा। मगर वर्ष 2002 में प्रदेश की कांग्रेस सरकार ने उत्तराखंड अवास-विकास परिषद का गठन करते हुए इसके अध्यक्ष पद पर सत्येंद्र चंद्र गुड़िया की ताजपोशी की और कैबिनेट मंत्री का दर्जा दिया। इसके बाद वर्ष 2007 में प्रदेश की भाजपा सरकार ने परिषद के अध्यक्ष पद का दायित्व नरेश बंसल को सौंपा, पांच साल के अंतराल के बाद एक बार फिर सत्ता परिवर्तन होने पर मौजूद सरकार ने अध्यक्ष पद पर सरवत करीम अंसारी की ताजपोशी की है। यानि पिछले ग्यारह वर्षों में प्रदेश सरकार ने उत्तराखंड आवास-विकास परिषद के अध्यक्षों की सुख-सुविधाओं पर लाखों रुपए खर्च किए। मगर धरातल पर परिषद कभी अस्तित्व में नहीं आया। वरना वर्तमान में उत्तराखंड आवास-विकास परिषद प्रदेश में जमीनों का अधिग्रहण करके आवासीय कालोनियों का निर्माण कर रहा होता। बहरहाल परिषद के पूर्णरूप से अस्तित्व में न आने की वजह चाहे जो भी हो, मगर करोड़ों रुपये की बेशकीमती कृषि भूमि को प्रदेश सरकार बिल्डरों को औने-पौने दाम में आवंटित कर रही है। जिस पर आवासीय कालोनी का निर्माण करके बिल्डर मनमाने दाम पर बिलॉज, प्लाट आदि की बिक्री कर रहे हैं। सूत्रों ने बताया कि हाल ही में प्रदेश सरकार ने सिडकुल-पंतनगर क्षेत्र में नैनीताल हाईवे पर एक कंपनी को करीब 25 एकड़ कृषि भूमि आवासीय कालोनी के निर्माण के लिए एलॉट की है।

अनियंत्रित विकास में नहीं है एसडीएम का दखल
रुद्रपुर। विनियमित क्षेत्रांतर्गत अगर कहीं पर अवैध निर्माण हो रहा है तो उस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी एसडीएम की है। सिडकुल भी विनियमित क्षेत्र की सीमा के भीतर है। मगर उसे औद्योगिक क्षेत्र घोषित किया गया है। इसलिए औद्योगिक क्षेत्र में अगर कोई अनियंत्रित विकास होता है अथवा अवैध निर्माण होता है तो उस पर अंकुश लगाने की जिम्मेदारी प्रदेश सरकार की एजेंसी सीडा की है, जिसके ज्यादातर अधिकारी देहरादून में बैठते हैं। इसलिए देहरादून में बैठ करके औद्योगिक क्षेत्र में हो रहे अवैध निर्माण पर अंकुश लगा पाना संभव नहीं हो पा रहा है। इस वजह से औद्योगिक क्षेत्र में धड़ल्ले से मानकों के विपरीत निर्माण कार्य किए गए हैं।
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