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बेहतर मुनाफे को करें तोरिया की खेती

Udham singh nagar

Updated Mon, 24 Sep 2012 12:00 PM IST
पंतनगर। तिलहनी फसलों में तोरिया अर्थात लाही की खेती कर किसान अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं। तोरिया 90 से 95 दिन के बीच तैयार हो जाती है, इसकी बुवाई का उपयुक्त समय 15 से 30 सितंबर तक रहता है। इधर, बरसात होने और मौसमी परिवर्तन के कारण राष्ट्रीय स्तर के वैज्ञानिकों ने तोरिया की बुवाई 10 अक्तूबर तक करने की सलाह किसानों को दी है। 10 अक्तूबर के बाद अर्थात विलंब से बुवाई करने पर पैदावार में एक कुंतल प्रति हेक्टेयर प्रति सप्ताह तक हानि हो सकती है।
तोरिया के लिए जल निकास वाली हल्की दोमट मिट्टी अति उत्तम रहती है, इसकी बुवाई के लिए खेत में पर्याप्त नमी का होना आवश्यक है। तिलहन वैज्ञानिकों ने तोरिया की अधिक उपज वाली पीटी 30, 303, 507 और उत्तरा प्रजातियों की बुवाई के लिए संस्तुति की है। उत्तराखंड के तराई एवं पर्वतीय क्षेत्रों के लिए पंत तोरिया 303 के अलावा वर्ष 2008 में विकसित उत्तरा प्रजाति सर्वाधिक उपयोगी पाई गई है।
प्रमाणित बीज उपलब्ध न होने पर घरेलू बीज का रसायनों से शोधन करके ही बुवाई करें। बुवाई के लिए बीज की मात्रा चार किग्रा प्रति हेक्टेयर होना चाहिए। बीज जमीन में 3-4 सेमी से अधिक गहराई में नहीं जाना चाहिए। गहराई में जाने पर जमाव में प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
बुवाई के 15-20 दिन बाद खेत से घने पौधे उखाड़कर पंक्तियों में पौधे से पौधे की दूरी 10-15 सेमी कर दें। खेत में प्रतिवर्ग मीटर पौधों की संख्या लगभग 33 होने पर फसल की बढ़वार अच्छी होगी। तोरिया में उर्वरकों का प्रयोग मृदा परीक्षण के आधार पर ही करना चाहिए। तोरिया तिलहनी फसल है, इसलिए इसमें सल्फर युक्त उर्वरकों जैसे सिंगिल सुपर फास्फेट का उपयोग करना चाहिए। सिंगिल सुपर फास्फेट उपलब्ध न होने पर जिप्सम का प्रयोग किया जा सकता है। तोरिया में मृदुरोमिल आसिता और सफेद फफोला रोग के प्रकोप की संभावना रहती है, जिसकी रोकथाम के लिए रिडोमिल की छह ग्राम मात्रा प्रति किग्रा बीज की दर से प्रयोग करना चाहिए।

कोहरे की संभावना होने पर राई की बुवाई करें
जिन क्षेत्रों में कोहरे की अधिक संभावना हो वहां तोरिया के स्थान पर किसान राई की बुवाई कर सकते हैं। राई की अगेती बुवाई के लिए पंत राई-19, नरेंद्र अगेती राई-4, कांति, एनपीजे-124 उपयुक्त प्रजातियां हैं। यह शीघ्र पकने वाली प्रजातियां हैं और उच्च तापमान के प्रति सहिष्णु हैं।
-डा.रामभजन, तिलहन विशेषज्ञ पंतनगर विवि
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