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शिल्पकला में युवा तराश रहे भविष्य

Udham singh nagar

Updated Tue, 18 Sep 2012 12:00 PM IST
रुद्रपुर। ग्रामीण युवा परंपरागत उद्यमों में रोजगार तलाश रहे हैं। महज दो वर्षों में ही प्रदेश के आठ जिलों के 532 युवाओं ने अपने कौशल को निखारने के लिए शिल्प कला का प्रशिक्षण लिया है।
गौरतलब है कि शिल्प कला पर आधारित बैग, कुशन, टोपियां, टोकरी, पर्स, शोफा, काष्ठ शिल्प, ऊन शिल्प, बांस एवं रेशा शिल्प, मोमबत्ती, ताम्र, लौह, फाइबर, पत्थर में नक्काशी के उत्पाद आज भी बेहद पसंद किए जाते हैं। यही वजह है कि युवाओं का रुझान अभी शिल्प कला के क्षेत्र में बना हुआ है। इसको देखते हुए दो वर्ष पहले राज्य में मुख्यमंत्री शिल्प विकास योजना संचालित की गयी है। प्रदेश में यह योजना पहले चरण में ऊधमसिंहनगर, चमोली, उत्तरकाशी, नैनीताल, अल्मोड़ा, बागेश्वर, पिथौरागढ़, रुद्रप्रयाग में चलाई जा रही है। इसके तहत रुद्रपुर स्थित उत्तराखंड ग्राम्य विकास संस्थान को प्रदेशभर के इच्छुक युवाओं को शिल्प कला में निपुण करने का जिम्मा सौंपा गया है। दो वर्ष की अवधि में ही प्रशिक्षण संस्थान में पांच सौ से अधिक शिल्पी अपने कौशल को निखारने का प्रशिक्षण ले चुके हैं। ऊधमसिंह नगर में शिल्प कला की ओर काफी रुझान देखा जा रहा है। अब तक 172 प्रतिभागी रेशा और काष्ठ कला का प्रशिक्षण ले चुके हैं। जबकि नैनीताल जिले से महज चार लोगों ने ही मूर्तिकला व लौह कला का प्रशिक्षण लिया है। महिलाओं को रेशा कला में प्रशिक्षण भा रहा है। इस कला में 143 महिलाएं प्रशिक्षित हो चुकी हैं। सबसे अधिक प्रशिक्षण में रुचि लौह और रेशा से बनने वाले उत्पादों में देखी जा रही है। इसी तरह चमोली जिले से 42 उत्तरकाशी के 40, अल्मोड़ा के 109, बागेश्वर के 27, पिथौरागढ़ के 107 और रुद्रप्रयाग के 31 युवा लौह, पत्थर नक्काशी, मूर्तिकला, बांस, रेशा कला के कौशल निखारने का प्रशिक्षण ले चुके हैं।
- परंपरागत उद्यम आज भी स्वरोजगार का सशक्त जरिया है। यही वजह है कि युवा वर्ग खासकर ग्रामीण युवाओं में अभी भी शिल्पकला में भविष्य बनाने का जज्बा बना हुआ है। संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले युवाओं को प्रमाण पत्र भी दिया जाता है।
डॉ विजय शंकर शुक्ला, अपर निदेशक, यूआईआरडी, रुद्रपुर।
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