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मजदूरों का माइग्रेशन भर रहा श्रम बोर्ड की झोली

Udham singh nagar

Updated Sat, 04 Aug 2012 12:00 PM IST
रुद्रपुर। मजदूरों का माइग्रेशन श्रम बोर्ड की झोली भरने में मुफीद साबित हो रहा है। मजदूरों के पंजीकरण शुल्क और सेस शुल्क से बोर्ड के पास अब तक 17.70 करोड़ रुपया जमा हो गया है। खास बात यह है कि मजदूर पंजीकरण शुल्क जमा तो कर देते हैं, लेकिन योजना का लाभ उठाने तक दूसरे शहरों या प्रांतों की ओर (माइग्रेशन) रुख कर जाते हैं, इससे लगातार बोर्ड मालामाल होता जा रहा है।
दरअसल, निर्माण कार्य से जुड़े मजदूरों को लाभान्वित करने और योजना का लाभ दिलाने के लिए उत्तराखंड भवन निर्माण एवं अन्य श्रमिक कल्याण बोर्ड का 2006 में गठन किया गया है, इसके तहत निर्माण कार्य से जुड़े मजदूरों के लिए औजार खरीद में दस हजार की मदद, स्वाभाविक मृत्यु होने पर परिजनों को 50 हजार और दुर्घटना होने पर एक लाख की सहायता, महिला श्रमिक को प्रसूति सुविधा के रूप में पांच हजार की सहायता देना है। पंजीकरण के लिए मजदूरों को श्रम विभाग में 75 रुपये सालाना शुल्क के रूप में जमा करना होता है। कम से कम एक साल की सदस्यता और पंजीकरण के नवीनीकरण के बाद पंजीकृत मजदूर योजनाओं का लाभ ले सकते हैं, लेकिन योजना का लाभ लेने से पहले ही मजदूर माइग्रेशन (पलायन) कर रहे हैं। मतलब, भवन निर्माण के लिए अधिकतर राजमिस्त्री/लेबर आज भी बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड सहित अन्य प्रांतों से आते हैं। काम पूरा होने के बाद ये लोग अपने घरों की ओर या फिर काम के लिए दूसरे प्रांतों की ओर रुख कर लेते हैं। इससे ये योजना का लाभ लेने से वंचित रहे जाते हैं।

सिर्फ दो प्रतिशत को ही मिला लाभ
प्रदेश में वर्तमान में करीब 4133 मजदूर बोर्ड में पंजीकृत हैं, इनमें से 784 कुमाऊं के और 3349 गढ़वाल मंडल में पंजीकृत हैं, लेकिन अब तक सिर्फ दो प्रतिशत लोगों लाभ उठाया है, जबकि बोर्ड के पास इस समय करीब 17.70 करोड़ रुपये की धनराशि खाते हैं। यह राशि मजदूरों के पंजीकरण शुल्क और सेस के रूप में जमा रुपयों से एकत्र हुई है। सेस शुल्क वह रकम है जो प्रतिष्ठान/बिल्डिंग स्वामी जमा करते हैं, जिनके निर्माण कार्य की लागत 10 लाख या इससे अधिक लगती है। ऐसे लोगों से श्रम विभाग बोर्ड में एक प्रतिशत सेस शुल्क जमा कराता है। इस तरह श्रम बोर्ड की झोली मजदूरों के रुपयों से भरी पड़ी है, लेकिन योजना का लाभ लेने से पहले ही मजदूर पलायन कर जा रहे हैं।

मजदूर एक साल से पहले ही एक स्थान से दूसरे स्थान को पलायन कर रहे हैं। मजदूरों का माइग्रेशन ही योजना का लाभ दिलाने में बाधक बन रहा है। हालांकि, बोर्ड के पास बजट की कोई कमी नहीं है।
पीसी तिवारी, असिस्टेंट लेबर कमिश्नर।
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