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नहीं बदली पुलिस की भाषा

Udham singh nagar

Updated Fri, 03 Aug 2012 12:00 PM IST
रुद्रपुर। बात थोड़ी अटपटी लगती है। मुगलों के दौर में प्रचलन में आए अरबी, फारसी और उर्दू के शब्द आज भी पुलिस की लिखा पढ़ी में चल रहे हैं। अधिकांश पुलिस कर्मियों को तो इन शब्दों के हिंदी अर्थ की जानकारी तक नहीं है। नए भर्ती हुए पुलिस कर्मियों के लिए अरबी फारसी के शब्दों को समझ पाना किसी चुनौती से कम नहीं होता है।
अंग्रेजों के शासन में भी मुगलकालीन शब्दों का प्रयोग चलता रहा। भले अंग्रेज बहुत पहले देश से चले गए हों। उनके जाने के बाद भी सरकारी काम का ढर्रा नहीं बदल पाया है। इसकी बानगी पुलिस विभाग में भी देखी जा सकती है। कहने को तो पुलिस की कामकाजी भाषा हिंदी है। मगर हिंदी में अरबी, फारसी और उर्दू के शब्दों का घालमेल कम नहीं है। आम लोगों के पल्ले तो पुलिसिया भाषा पड़ती नहीं, खुद पुलिस वाले भी इन शब्दों के अर्थ को लेकर पसोपेश में पढ़ जाते हैं।
पुलिस कर्मी भी मानते हैं कि उनके विभाग की कामकाजी भाषा अलग है। अरबी, फारसी और उर्दू शब्दों का प्रयोग वर्षों से चला आ रहा है। जांच को यहां आज भी तफ्तीश, सौंपने को सुपुर्दगी और किसी के बारे में पुष्टि करने को तस्दीक ही लिखा जाता है। लिखा पढ़ी के दौरान नए पुलिस कर्मियों को इन शब्दों के अर्थ समझने में पसीने छूट जाते हैं। पुलिस कर्मियों के साथ ही अधिकारी भी इन शब्दों के साथ आसानी से तालमेल करने में असहज महसूस करते हैं। पुलिस कर्मी भी दबी जुबान से स्वीकारते हैं कि इन शब्दों में बदलाव होना चाहिए और इनके बदले हिंदी शब्दों का प्रयोग किया जाना चाहिए।

ये हैं वो शब्द:-
रवानगी- प्रस्थान करना
आमद- पहुंचना
सुपुर्दगी- सौंपना
तफ्तीश- जांच
हमराह- साथ में
तस्दीक- किसी के बारे में पुष्टि करना
तामील- आज्ञा का पालन करना
समन -अदालत का आदेश
दबिश-छापामारी

क्या कहते हैं पुलिस अधिकारी
-एसएसपी नीलेश आनंद भरणे ने माना कि आम बोलचाल में इन शब्दों का प्रयोग नहीं होता है। इसलिए पुलिस अधिकारियों और कर्मियों को शुरू में काफी दिक्कतें आती हैं। उन्होेंने कहा कि इन दिक्कतों को दूर करने के लिए कर्मचारियों को शब्दों के वास्तविक अर्थों के बारे में बताया जाएगा। इसके लिए जल्द कार्यशाला आयोजित की जाएगी।
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