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अब कौन गुनगुनाएगा चुप रा छोरौं हल्ला न करा

Tehri

Updated Mon, 05 Nov 2012 12:00 PM IST
चंबा (टिहरी)। चुप रा छोरौं हल्ला न करा, मंत्री दिदा सेणू छा गीत भले ही सबकी जुबान पर हो, लेकिन शायद ही कुछ लोगों को पता होगा कि यह शंकर शंभू का रचित गीत था। यह वहीं गाना था, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री डा. रमेश पोखरियाल निशंक, भगत सिंह कोश्यारी और नित्यानंद स्वामी को केंद्र बनाकर उनके शासनकाल में हुए जनविरोधी कार्यों का उल्लेख्,ा किया गया था। बाद में भाजपा सरकार ने इस गाने पर ही प्रतिबंध लगा दिया था। इसके साथ ही उन्होंने कई गानों को अपना स्वर भी दिया था। 90 के दशक में शंभू के कुंज कला मंच सूचना विभाग का गढ़वाल मंडल का रजिस्टर्ड मंच था। जिसके माध्यम से सांस्कृतिक कार्यक्रम किए जाते थे। हेेंवलघाटी क्षेत्र में होने वाली रामलीला में भी वे कई पात्रों की भूमिका भी निभा चुके हैं। शंकर शंभू के परिवार की आर्थिक स्थिति पहले से ही खराब चल रही थी। वे जिदंगी के आखिरी दौर में बहुत ही दयनीय स्थिति में जीये। कुछ माह पहले ही उनकी दोनों किडनियां फेल हो गई थी और वे जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे। आज शंकर शंभू की गुमनाम मौत हो गई है। यदि समय रहते सरकार या संस्कृति विभाग उनकी सुध लेता तो शायद ठीक से अपना इलाज करा पाते। उनके निधन की खबर से संस्कृति कर्मी भी गमजदा हैं।
कोट-
लोक कलाकारों को प्रोत्साहन देने के लिए सरकार को सामूहिक बीमा योजना बनानी चाहिए। साथ ही पेंशन की सुविधा देनी चाहिए। ताकि आर्थिक संकट से शंकर शूंभ की तरह किसी और लोक कलाकर को उपचार के लिए सरकारी मदद के लिए मोहताज न रहने पडे़। -प्रो.डीआर पुरोहित प्रसिद्व रंगकर्मी

इनसेट
लोक कलाकार शंकर शंभू नहीं रहे
चंबा (टिहरी)। लोक कलाकार और कामेडियन शंकर शभू रावत के आकस्मिक निधन पर क्षेत्र में शोक की लहर फैल गई। वह लंबे समय से अस्वस्थ चल रहे थे। उनके निधन से क्षेत्रवासी सदमे में हैं। किसी को भी विश्वास नहीं हो रहा है कि उनको गुदगुदाने वाला शंभू अब कभी भी मंच पर उनको हंसा नहीं पाएगा। रविवार को ऋषिकेश के पूर्णानंद घाट में उनका अंतिम संस्कार किया गया।
हेंवलघाटी के अटाली गांव निवासी 50 वर्षीय शंकर शंभू ने 80 के दशक में स्टैंड अप कामेडी का आगाज किया था। इसके बाद 90 के दशक में उन्होंने लोक संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए खाड़ी में कुंज कला मंच की नींव रखी। जिसके माध्यम से उन्होंने उत्तराखंड के सभी बड़े शहरों से लेकर दिल्ली तक संस्कृति के संरक्षण के साथ ही युवाओं को मंच देने का मौका दिया गया। 1983 में उन्होंने जागृति कला मंच के साथ समाज को जागरूक करने के लिए पदयात्रा, कठपुतली कार्यक्रम भी किए। वर्ष 2000 से वे जीएमवीएन में संविदा कर्मी के तौर पर सेवाएं देते आ रहे थे। शनिवार देर रात्रि को उन्होंने आखिरी सांसें लीं। वे अपने पीछे पत्नी बसंती देवी और 16 वर्षीय बेटी को छोड़ गए हैं। शंकर शंभू के असमय काल के गाल में समा जाने पर अरण्य रंजन, रणवीर रौतेला, फूलदास, नरेंद्र रौतेला, विक्रम भंडारी, अनिल भंडारी आदि ने शोक व्यक्त करते हुए क्षेत्र के लिए अतुलनीय क्षत्ति बताया।
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