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घिरते बादल दिला रहे काली रात की याद

Rudraprayag

Updated Fri, 28 Sep 2012 12:00 PM IST
रुद्रप्रयाग। आसमान में घिरते बादलों की गरज से प्रभावितों की रूह कांप जाती है। 13/14 सितंबर की काली रात की यादें अभी भुलाई ही नहीं जा पा रहीं कि फिर गरजते बादल एक अनहोनी की दस्तक दे जाते हैं। ऊखीमठ के आपदा प्रभावित क्षेत्रों में खतरे का सबब बने घरों में रहना यहां के लोगों की मजबूरी बनी हुई है। उन्हें ये चिंता सता रही है कि आखिर जाएं तो कहां।
आपदा के 13 दिन बाद प्रभावित क्षेत्रोें का जायजा लेने जब अमर उजाला की टीम इन गांवों में पहुंची तो देखा कि लोगों की मौजूदा स्थिति अब भी सामान्य नहीं हो पाई है। प्रभावित अपने घर से मलबा हटाकर दोबारा से जीवन पटरी पर लाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन ये प्रकृति उन्हें दोबारा से दहशत में डाल देती है। सरकार की ओर से सामान बर्बाद होने पर अहैतुक सहायता के तौर पर 5400 रुपये दिए जा रहे हैं, लेकिन मलबे के ढेरों को हटाने में लोगों के हजारों खर्च हो चुके हैं।

शवों से आ रही सड़ांध
ऊखीमठ केे ठीक सामने विद्यापीठ पुल होते हुए मलबा से पटे रास्ते को पार कर जब हम चुन्नी गांव पहुंचे तो देखा कि जानवरों के शवों को गांव में ही दफनाया गया है, जिससे सड़ांध फैल रही है। पशुपालन विभाग ब्लीचिंग पाउडर डालकर गंध कम करने की कोशिशें कर रहा है जो नाकाफी है।

यहां गूंजती होगी किलकारी
कुछ दूरी पर जाने पर हमें मलबे में एक झूला दिखाई दिया तो बस यही ख्याल आया कि कभी इसमें भी एक नन्हीं किलकारी घर को रोशन करती रही होगी। लेकिन यहां आई आपदा ने सब वीरान कर दिया।

नहीं छोड़ पा रहे घर
चुन्नी गांव के निवासी राजेंद्र तिवारी, रामेश्वर और अनूप तिवारी ने बताया कि वे न अपना मकान छोड़ पा रहे हैं और न उनमें रह पा रहे हैं। जहां घर थे, वहां मलबा पड़ा है। घरों के अंदर से मलबा हटाने को प्रतिदिन 300 रुपये मजदूरी पर मजदूर लगाए हुए हैं। मलबा हटानेे में शासन से मिले 5400 रुपये क्या 54 हजार भी कम हैं।

‘जवान बच्चे बह गए हम जीकर क्या करें’
चुन्नी गांव के बाद टीम बाबा काली कमली धर्मशाला के रिलीफ सेंटर पहुंची। यहां देखा कि सेंटर में प्रेमनगर के छह परिवारों के 35 लोग रह रहे हैं। कुछ बच्चे खेल रहे हैं, लेकिन उनकी मां गुुमसुम खड़ी भी। जबकि कुछ बुजुर्ग कह रहे थे कि हमारे जवान बच्चे बाढ़ में बह गए हैं, हम जीकर क्या करें? आपदा में अपना सुहाग खो चुकी 20-21 साल की तुंगलेश्वरी और सुनीता अपने दुधमुंहे बच्चों को गोद में लिए थीं लेकिन कुछ नहीं बोल पाईं। हमें भी उनकी हालत देख कुछ पूछने की हिम्मत नहीं हुई। हमें कुछ लोगों ने बताया गया कि तुंगलेश्वरी के एक बच्चे की तबियत खराब हो गई है, जिसे बेस अस्पताल श्रीकोट से देहरादून रेफर किया गया हैै।

हाथ जोड़कर स्थायी छत मांगी
वृद्धा दर्शनी देवी कहती हैं कि खेती नहीं रही, गृहस्थी नहीं रही, घर का पता नहीं है, ऐसे में कहां जाएं। उन्होंने जब दोनों हाथ जोड़कर स्थायी छत दिलाने का अनुरोध हमसे किया तो हम खुद को उनके सामने बौने लगे।
ऊखीमठ बाजार क्षेत्र का निरीक्षण करते हुए एसडीएम राकेश तिवारी और तहसीलदार लक्ष्मण सिंह पिंगल भी मौके पर मिल गए। एसडीएम ने कहा कि प्रभावित लोगों का जीवन खतरे से बाहर रहे, यह उनकी प्राथमिकता है।
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