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कौन सुनेगा इन शिक्षकों की

Rudraprayag

Updated Tue, 21 Aug 2012 12:00 PM IST
केस 1: अंजू झिंक्वाण दुर्गम क्षेत्र में स्थित प्राथमिक विद्यालय नगली (जिला चमोली) में शिक्षिका हैं। वह विकलांग हैं और उन्हें चलने-फिरने में भी दिक्कत होती है। दुर्गम/अति दुर्गम क्षेत्र में वह 18 साल से तैनात हैं।
केस 2: जयेेंद्र प्रसाद डिमरी पेशे से प्राथमिक विद्यालय उर्खोली में हेडमास्टर हैं। वह दुर्गम/अतिदुर्गम क्षेत्र में 30 साल से तैनात हैं और उनके रिटायरमेंट के सिर्फ तीन साल बचे हैं।

रुद्रप्रयाग। अंजू और जयेंद्र ऐसे शिक्षक हैं, जो सरकार की तबादला नीति के तहत सुगम क्षेत्रों में अपने तबादले का बेसब्री से इंतजार कर रहे थे, लेकिन सरकार ने तबादला शून्य सत्र कहकर एक झटके में उनकी आशाओं को झटका दे दिया।
शिक्षा विभाग बिना पहुंच वाले शिक्षकों की नहीं सुनता। विभाग में शायद मानवीय संवेदना भी शून्य है। विभाग ने विकलांग शिक्षिका अंजू झिंक्वाण की पोस्टिंग ऐसे विद्यालय में कर दी, जो अतिदुर्गम क्षेत्र में स्थित था। अंजू की नियुक्ति 1995 में गैरसैंण ब्लॉक के प्राथमिक विद्यालय कूनीगाड़ (तब 7 किमी पैदल) में हुई। डेढ़ साल बाद उनकी तैनाती दुर्गम क्षेत्र के प्रावि नगली में कर दी गई। तब से वह उसी स्कूल में तैनात हैं। समस्या यह है कि अंजू का मूल जिला रुद्रप्रयाग है। उसके पति भी विकलांग हैं। उनको भी चलने-फिरने की दिक्कत है। वह शासकीय सहायता प्राप्त जूनियर हाईस्कूल अरखुंड में शिक्षक हैं। झिंक्वाण दंपति पिछले 15 सालों से मुख्य सचिव से लेकर विभागीय सचिव/अधिकारियों के समक्ष अपनी परेशानी बयां कर चुके हैं, लेकिन किसी भी अधिकारी का दिल नहीं पसीजा। इसी तरह 57 वर्षीय जयेंद्र प्रसाद डिमरी अपनी सेवा की शुरुआत से अतिदुर्गम क्षेत्र में तैनात हैं। दो साल पूर्व शासन से उनका तबादला दुर्गम क्षेत्र में हुआ, लेकिन किसी प्रतिस्थानी के न आने के कारण वह रिलीव नहीं हो पाए। अंजू और जयेंद्र जैसे कई शिक्षक हैं, जो सालों से दुर्गम क्षेत्रों में तैनात हैं, लेकिन उनकी फरियाद हर बार अनसुनी रह जाती है। अब रुटीन में तबादले की आस बंधी थी, वो भी धराशायी हो गई।

मेरे दो बच्चे हैं जो अपने पिता के साथ रहते हैं। मेरी तैनाती प्रावि नगली में है जिस कारण मेरे बच्चों की ठीक से देखभाल नहीं हो पा रही है। मुझे सुगम में नहीं बल्कि अपने मूल क्षेत्र में तैनाती चाहिए। इस संदर्भ में कई बार अधिकारियों से गुहार लगाई गई लेकिन किसी ने नहीं सुनी।
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