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सेव टाइगर की मुहिम पर सवाल, सालभर में 87 मरे

प्रेम प्रताप सिंह/देहरादून

Updated Tue, 25 Dec 2012 10:46 AM IST
question raised on save tiger campaign
बाघ प्रेमियों के लिए अच्छी सूचना नहीं है। 2012 का साल बाघों पर भारी गुजरा है। देश में 24 दिसंबर तक 87 बाघों की मौत हो चुकी है। इनमें से 29 का शिकार हुआ है, जबकि अन्य की मौत सड़क दुर्घटना, आपसी संघर्ष और प्राकृतिक कारणों से हुई है। ये आंकड़े नेशनल टाइगर कंजर्वेशन अथारिटी (एनटीसीए) के बाघ बचाने को लेकर चलाए जा रहे अभियान पर सवाल खड़ा करने के लिए काफी हैं।
केंद्र और प्रदेश सरकारों के तमाम दावों के बावजूद शिकारियों पर नकेल नहीं कसी जा रही है। देश में बाघों को बचाने के नाम पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावजूद उनकी सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम नहीं हैं। एक गैर सरकारी संस्था के आंकड़ों के अनुसार 2012 में 24 दिसंबर तक 87 बाघों की मौत या हत्या हो चुकी है। उत्तराखंड में तो चार शावक आग में जलकर खाक हो गए। 2011 में 61 और 2010 में 58 बाघों की मौत हुई थी। उत्तराखंड में सबसे अधिक लगभग 18 बाघों की मौत हुई है। दूसरे नंबर पर महाराष्ट्र और तीसरे नंबर पर कर्नाटक है।

बाघों के बचाने के लिए हो रही कोशिशें
-कार्बेट सहित देश के कई टाइगर रिजर्व में थर्मल कैमरे लगाए
-टाइगर प्रोटेक्शन फोर्स के गठन की प्रक्रिया शुरू की गई
-बाघों की सुरक्षा को चौकस करने की कवायद हुई
-देश भर में करोड़ों रुपये हो रहे सुरक्षा पर खर्च

अंतरराष्ट्रीय गिरोह ने दी थी सुपारी
बताया जाता है कि किसी अंतरराष्ट्रीय गिरोह ने देश के लगभग 25 बाघों को मारने की सुपारी दी थी। इसमें से नौ बाघों की हत्या मई में ही कर दी गई थी। इसमें महाराष्ट्र, उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश के बाघ शामिल हैं। इन गिरोहों को पकड़ने के लिए उत्तराखंड से लेकर महाराष्ट्र सरकार तक ने कोई पहल नहीं की।

मंद गति से विवेचना
देश में प्राकृतिक रूप से मरने और शिकार होने वाले बाघों की विवेचना बेहद मंद गति से हो रही है। उत्तराखंड से लेकर केरल तक में 30 बाघों की किन कारणों से मौत हुई, इसकी रिपोर्ट आज तक एनटीसीए का नहीं दी गई है जबकि, साल खत्म होने वाला है। इसे लेकर भी वन विभाग के अधिकारियों की कार्य प्रणाली पर सवाल खड़ा हो रहे हैं।

देश में बाघों की मौत
साल              संख्या              
2012                87
2011                61                      
2010               58
2009               95

नए रणनीति की जरूरत
एनटीसीए के सदस्य विजेंद्र सिंह का कहना है कि कुछ मौत तो प्राकृतिक हैं। चिंता इस बात को लेकर है कि 2012 में शिकारी फिर से सक्रिय हो गए है। इसका नतीजा रहा कि 2011 के मुकाबले 2012 में अवैध शिकार की घटना 13 से बढ़कर 29 पहुंच गई है। इस पर नए सिरे से रणनीति बनाने की जरूरत है।
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