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सामाजिक बुराइयों के खात्मे को खोला मोर्चा

Pithoragarh

Updated Sat, 20 Oct 2012 12:00 PM IST

पिथौरागढ़। बालिकाओं को हमारी संस्कृति में देवी का अवतार माना जाता है। इन दिनों भी नव दुर्गा का पूजन हो रहा है। पर इनके अलावा भी हमारे समाज में कई देवियां हैं, जो समाज में बुराइयों से लड़ रही हैं और समाज को जगा रही हैं। रेणु ठाकुर ऐसी ही एक देवी हैं, जो मानवाधिकार हनन से लेकर बच्चियों को बचाने की लड़ाई लड़ रही हैं।
गंगोलीहाट विकासखंड की अनुसूचित महिला विमला घरेलू हिंसा की शिकार थीं। पति ने दूसरी शादी कर विमला को सड़क पर ला दिया। विमला के पास न घर बचा और न कोई ठिकाना। रेणु ठाकुर ने साझा मंच संस्था के माध्यम से इस लड़ाई को लड़ा और मुकाम तक पहुंचाया। विमला को उसका हक दिलाया। कानूनी लड़ाई के जरिए पति से मुआवजा एवं अन्य अधिकार उसे दिलाए। रेणु के काम की ये बानगीभर है। मानवाधिकार हनन, महिला घरेलू हिंसा एवं कन्या भ्रूण परीक्षण के खिलाफ निरंतर अभियान उनकी जिंदगी का हिस्सा हो गया है। करीब डेढ़ दशक से वह बिना रुके इन्हीं जज्बातों को अपने काम के जरिए आगे बढ़ा रही हैं।
महिला घरेलू हिंसा को दूर करने के लिए शहर से अधिक ग्रामीण क्षेत्रों को उन्होंने फोकस किया है। कनालीछीना, धारचूला जैसे विकासखंडों में उन्होंने लोगों को जागरूक किया है। महिलाओं के खिलाफ अन्याय की लड़ाई में वह पुरुषों का भी साथ ले रही हैैं। रेणु का कहना है कि बेशक ये लड़ाई समाज की आधी आबादी की है मगर इसमें जीत के लिए पुरुषों की मानसिकता में बदलाव जरूरी है। इसके लिए महिला अधिकार संगठन एवं किशोरी संगठन को हथियार बनाया गया है।
रेणु ठाकुर दुर्गा पूजन को कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ अभियान से जोड़ रही हैं। उनका कहना है कि हमारी संस्कृति में देवी पूज्य है। यह मान्यता तभी सार्थक होगी, जब कन्या भ्रूण हत्या पूरी तरह बंद हो। इसे लेकर वह अर्पण संस्था के माध्यम से पहल कर रही हैं। अब तक इस संबंध में 70 संकल्प पत्र भरवा चुकी हैं। उनका कहना है कि जिले में छह साल तक की बालिकाओं के अनुपात में जबर्दस्त गिरावट हो रही है। प्रति एक हजार बालकों के सापेक्ष 1991 में बालिकाओं की संख्या 964 थी। लेकिन 2011 में ये संख्या 812 हो गई है। उनके इन तमाम प्रयासों को उत्तराखंड सरकार ने भी कुछ वर्ष पूर्व तीलू रौतेली पुरस्कार से सम्मानित कर मान्यता दी।

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