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तब नींबू के खोल में लीसा डाल होता था उजाला

Pithoragarh

Updated Thu, 18 Oct 2012 12:00 PM IST

पिथौरागढ़। नेपाल सीमा पर स्थित झूलाघाट की रामलीला सुनहरे अतीत की गवाह है। एक सौ साल से लंबे इतिहास में तमाम तरह के उतार-चढ़ाव से इस लीला का सामना हुआ है। इस इलाके के लोग ही नहीं सीमा पार नेपाल के बैतड़ी जिले के निवासी भी यहां के मंचन का आनंद उठाते थे।
झूलाघाट की लीला जिले की सबसे पुरानी रामलीलाओं में से है। रामलीला कमेटी के अध्यक्ष कैलाश भट्ट का कहना है कि 1900 में झूलाघाट में पहली बार लीला का आयोजन किया गया। इस लीला का आयोजन करने के लिए भीमताल से रामलीला नाटक की एक प्रति लाई गई और इसी को आधार बनाकर यहां मंचन शुरू हुआ। उस वक्त यहां की आबादी चार सौ के करीब थी। तब स्टेज के लिए टाट, बोरों एवं कंबलों का प्रयोग होता था। पात्रों की वेशभूषा के कपडे़ भी स्थानीय स्तर पर ही तैयार होते थे। धनुष, मुकुट आदि भी स्थानीय लोग ही तैयार करते थे।
यहां 1968 तक रोशनी के लिए नींबू के खोल में लीसा डालकर और चीड़ के गूदे वाली लकड़ी का प्रयोग किया जाता था। साल 1968 में पहली बार लालटेन और फिर पेट्रोमैक्स का उपयोग किया गया। झूलाघाट में 80 के दशक में बिजली आने के बाद हालात बदले। कलाकारों की काबिलियत से समझौता नहीं होता था। अस्कोट और पिथौरागढ़ तक से मंचन के लिए पात्र आते थे। पात्रों के लिए अनुशासन, परहेज और मर्यादा जरूरी था। तालीम शुरू होने से लेकर रामलीला का मंचन पूरा होने तक सभी पात्र एक ही जगह रहते थे। संगीत के लिए सारंगी और तबला वादन के लिए बाहर से उस्ताद आते थे। मगर अब सारंगी के स्थान पर हारमोनियम का उपयोग किया जाने लगा। काली नदी पर पुल बनने के बाद नेपाल के बैतड़ी जिले के आधा दर्जन गांवों के लोग भी रामलीला का आनंद उठाते आते थे। तब नेपाल के उस हिस्से में लीला का मंचन नहीं होता था।
उर्वादत्त पंत (75) और शिवदत्त भट्ट (88) की रामलीला में की गई अदाकारी को लोग अब भी नहीं भूले हैं। और अब भी ये दोनों बुजुर्ग लीला में अपना सहयोग दे रहे हैं। लीला कमेटी के पदाधिकारियों का कहना है कि1900 से सिर्फ एक बार छोड़ ये लीला लगातार जारी रही है। 1994 में राज्य आंदोलन में दमन चक्र के विरोध में यहां लीला का आयोजन नहीं किया गया।

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