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कुछ ही घंटों में बदल गया सारा नजारा

Pauri

Updated Sun, 02 Dec 2012 05:30 AM IST
पौड़ी। पशुबलि के लिए देश भर में विख्यात रहे बूंखाल मेले में पिछले साल से पशुबलि बंद होने से इस बार मेले का नजारा भी समय-समय बदलता रहा। मेले में करीब नौ बजे तक चौरीखाल से लेकर बूंखाल मंदिर परिसर तक अन्य सालों की अपेक्षा सन्नाटा जैसा लग रहा था। लोगों ने पशु बलि बंद होने से मेले के स्वरूप को लेकर तरह-तरह कयास लगाने शुरू कर दिए थे, लेकिन 11 बजे के बाद श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ गया। कुछ ही घंटों में नजारा बदला-बदला नजर आया। देर शाम तक मंदिर में लोगों का तांता लगा रहा।
बूंखाल मेला लाइव-कब क्या रहा सीन
सुबह आठ बजे
चौरीखाल रोड हेड पर पुलिस फोर्स का जमावड़ा। चौरीखाल बाजार से बूंखाल मंदिर परिसर तक चप्पे-चप्पे पर पुलिस बल तैनात। बूंखाल मंदिर में हवन यज्ञ की तैयारी करते पुजारी समेत तमाम लोग, जो आठ बजे तक अन्य सालों की अपेक्षा पांच फीसदी भीड़ होने के कारण मेले को स्वरूप में आए बदलाव को लेकर चर्चा में मशगूूल थे।
सुबह नौ बजे
मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं का आगमन बढ़ने लगता है। देवी के कुंड में नारियल चढ़ने शुरू हो जाते हैं। मंदिर परिसर में बने हवन यज्ञ में पूजन शुरू हो जाता है, लेकिन पहले के बराबर भीड़ कम होने से पशुबलि बंद होने से मेले की स्थिति को लेकर कयास जारी।
सुबह दस बजे
श्री बद्री केदार मंदिर समिति के अध्यक्ष बनने के बाद पहली बार क्षेत्रीय विधायक गणेश गोदियाल ने चौरीखाल और बूंखाल में मंदिर में जाकर पूजा अर्चना की। जीएमवीएन के पूर्व उपाध्यक्ष राजेंद्र्र रावत भी उनके साथ मौजूद थे। विधायक गोदियाल में बूंखाल मंदिर में नारियल चढ़ाकर विधिवत यज्ञ पूजन किया।
सुबह 11 से 12 बजे
अचानक श्रद्धालुओं की संख्या बढ़नी शुरू हो गई। लोग निशान को लेकर मंदिर में पहुंचने लगे। 12 बजे के बाद तो मंदिर में नारियल चढ़ाने के लिए कतारें लगनी शुरू हो गई। बड़ी संख्या में लोगों ने मंदिर में नारियल चढाकर पूजा अर्चना की।
दिन में एक बजे
गांवों से ढोल दमाऊ के साथ देवी देवताओं की डोलिया आनी शुरू हुई। लोग उत्साहित हो उठे। मंदिर में सबसे पहले चोपड़ा गांव की डोली पहुंची। इसके बाद बाली कंडारस्यूं के नौठा समेत विभिन्न गांवों की, फिर नलई, मलुंड, मिथ गांव की डोलियां मंदिर में पहुंची। डोलियों के साथ सैकड़ों लोग शामिल थे। डोलियों से मंदिर की परिक्रमा कराकर पूजा अर्चना की गई। इस दौरान पूरा क्षेत्र जय माता की बोल गूंज रहा था। करीब पांच बजे तक मंदिर में श्रद्धालुओं का तांता लगा रहा।




आज भी अटूट आस्था है देवी के प्रति
सदियां बीत जाने के बाद भी राठ क्षेत्र में बूंखाल कालिंका के प्रति अटूट आस्था है। कहा जाता है कि सच्चे मन से देवी के दर्शनाें से सभी कष्टों का नाश हो जाता है। पशुबलि के लिए चर्चित बूंखाल कालिंका के अधिकांश क्षेत्र में स्वास्थ्य, शिक्षा व यातायात समेत तमाम सुविधाओं का घोर अभाव रहा है। विपत्ति के निपटने के लिए लोग अपनी आराध्य देवी को पुकारना आज भी नहीं भूलते हैं। बुजुर्ग कहते हैं गोरखाओं के आक्रमण के दौरान मां कालिंका ग्रामीणों को आवाज लगाकर उन्हें गोरखाओं के आक्रमण से सचेत करती थी। तब एक बार गोरखाओं ने देवी की मूर्ति को जमीन में उल्टा गाड़ दिया। तब से देवी द्वारा आवाज लगाना बंद हो गया। तब इसे दैवी द्वारा धै लगाना कहा जाता था।

सांस्कृतिक कार्यक्रमों की रही धूम
बूंखाल कालिंका मंदिर परिसर में गढ़वाली गायक अनिल बिष्ट के गीताें की धूम रही। युवा कल्याण विभाग की पहल पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रमों में जागरूकता के कई संदेश दिए गए। बड़ी संख्या में लोगों ने इन प्रस्तुतियों का लुत्फ उठाया। इस मौके पर युवा कल्याण अधिकारी केकेएस रावत, युवा समिति के अध्यक्ष त्रिभुवन उनियाल समेत कई लोग मौजूद रहे।


बूंखाल में बलि नहीं देने को किया प्रेरित
श्रीनगर। आद्य शक्ति मां धारी देवी न्यास के प्रतिनिधिमंडल ने बूंखाल के कालिंका मंदिर पहुंचकर बूंखाल मेले में रक्तहीन मेले के लिए ग्रामीणों को प्रेरित किया। मंदिर न्यास के अध्यक्ष और सदस्यों ने सात्विक पूजा के महत्व के बारे में भी लोगों को बताया।
कालिंका मंदिर पहुंचे धारी देवी मंदिर न्यास के प्रतिनिधियों ने यज्ञ-हवन कर मंदिर में सात्विक पूजा के महत्व को बताया। इस मौके पर न्यास के अध्यक्ष सच्चिदानंद पांडे ने कहा कि धारी देवी मंदिर में भी 1980 से पहले बलि देकर ही मां को प्रसन्न किया जाता था, लेकिन अब यह प्रथा पूरी तरह बंद हो चुकी है। उन्होंने इस वर्ष आयोजित मेले में बलि का विरोध करने के लिए क्षेत्र के लोगों से अपील की। प्रतिनिधिमंडल में लक्ष्मी प्रसाद पांडे, संजय पांडे, सचिव विवेक पांडे आदि शामिल थे।


महिलाओं ने की जमकर खरीदारी

-बूंखाल मेले में लगी चूड़ियों समेत विभिन्न चीजों की दुकानों में लोगों ने जमकर खदीददारी की। महिलाओं और बच्चों में खरीददारी करने को लेकर काफी क्रेज बना हुआ था। मंदिर परिसर में पकवान भी खूब बिके।
पुलिस को नहीं करनी पड़ी कोई मेहनत
-बूंखाल मेले में भले ही मेला परिसर में भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया था, लेकिन मेला परिसर में व्यवस्थाएं शांतिपूर्ण रहने के कारण पुलिस को ज्यादा मेहनत नहीं करनी पड़ी। सुबह भीड़ कम होने के कारण पुलिसकर्मी और अधिकारियों ने भी आराम से मंदिर के दर्शन करने का मौका नहीं चूका।






बूंखाल मेले को क्षेत्रवासियों की जुबानी
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‘बूंखाल मेले पशुबलि बंद होने मेले का स्वरूप बदल गया है। लोगों को मेले की तरफ आकर्षित करने के लिए शासन प्रशासन और स्थानीय लोगों द्वारा नए प्रयास किए जाने की जरूरत है।’
-जगदीश गोदियाल निवासी गोदा
‘-बूंखाल मेले में पशुबलि पर रोक लगना अच्छी बात है। लेकिन इससे मेले में श्रद्धालुओं की संख्या कम हो रही है। इसको बढाने के लिए शासन प्रशासन को इसे आकर्षक बनाने का प्रयास करना चाहिए।’
विश्व मोहन गोदियाल निवासी गोदा
‘लंबे प्रयासों के बाद बूंखाल मेले में पशुबलि समाप्त हुई है। अच्छा वातावरण बना है। प्रशासन द्वारा मंदिर, क्षेत्र और मेले के विकास हेतु मेला समिति को गठित कर इससे क्षेत्र के लोगों को जोड़ने का सुझाव दिया गया है। इस मेले को नया रूप देने के लिए शासन-प्रशासन और क्षेत्रवासियों को सामूहिक रूप से कार्य करने की जरूरत है। ’’
रमेश गोदियाल पुजारी बूंखाल मंदिर
‘सभी के सामुहिक प्रयासों से बूंखाल मेले में पशुबलि बंद हो गई। प्रशासन को क्षेत्र के विकास के साथ स्थानीय लोगों को रोजगार मुहैया कराने की दिशा में सोचना चाहिए।’
विकास हंस क्षेत्रवासी
‘बूंखाल मेले में पशुबलि बंद होने से अधिकांश युवा उत्साहित है। इसको बंद करने के लिए काफी प्रयास किए। लोगों का गुस्सा भी झेलना पड़ा। अब लोगों में जागरूकता आ गई।’
कंचन छात्र राठ महाविद्यालय पैठाणी
‘पिछले सालों तक पशुबलि के खिलाफ आवाज उठाने में हमें लोगों का गुस्सा झेलना पड़ता था, लेकिन इस बार काफी खुशी हो रही है। पशुबलि के बंद के खिलाफ किसी में आक्रोश नहीं है।’
आशा छात्र राठ महाविद्यालय पैठाणी



‘लंबे संघर्ष के बाद बूंखाल मेले में पूरी तरह पशुबलि बंद हो गई है। लोगों में पशुबलि के विरोध के प्रति आक्रोश भी नहीं है। अब बीरोंखाल ब्लाक में कुमायूं और गढ़वाल के बीच में पढने वाले कालिंका में मंदिर में इस कुप्रथा को समाप्त करने के प्रयास होंगे।’
गबर सिंह राणा चक्रवर्ती प्रचारक पशु बलि निषेध समिति
‘बूंखाल मेले में इस बार जो नई परंपरा शुरू हुई है। वह काफी सराहनीय है। मेले में आगे भी इस पर निरंतरता बनाए रखने की जरूरत है।’
सरिता नेगी अध्यक्ष बिजाल सामाजिक संस्था
‘बूंखाल मेले में डांठी कांठी संस्था द्वारा पहली बार बागी के स्थान पर ग्रामीणों को डोली लाने हेतु प्रेरित किया है। इससे मेले के इतिहास में इस बार नई परंपरा की शुरूआत हुई है।’
राकेश खंकरियाल सदस्य डांडीकांठी संस्था

‘बूंखाल मेले में रक्तहीन क्रांति को इस बार भी बरकरार रखना प्रशासन समेत भी लोगों के लिए चुनौती थी। प्रशासन, सामाजिक संस्थाओं, स्थानीय लोगों के सामुहिक प्रयासों से मेले में इस बार भी पशुबलि नहीं हुई है। इसके लिए सभी ने काफी मेहनत की। जो एक अच्छा संदेश है।’
चंद्रेश कुमार यादव जिलाधिकारी पौड़ी गढ़वाल
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