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गढ़वाल राइफल्स संग लैंसडौन भी 125 साल का

Pauri

Updated Wed, 31 Oct 2012 12:00 PM IST
लैंसडौन। गढ़वाल राइफल्स और लैंसडौन दोनों साथ जन्मे थे। इस साल 125 बरस के हो गए हैं। इस छावनी नगर में सेना हमेशा सिविल लोगों के साथ मिलकर जश्न मनाती थी। लेकिन इस बार सिविल लोग जश्न से दूर हैं। सेना ने इस बार अलग समारोह मनाने का मन बनाया है। दूसरी ओर आम लोगों में उल्लास नदारद है।
125 साला जश्न की रौनक सेना में तो दिख रही
सेना ने आयोजित करने शुरू कर दिए हैं। जगह-जगह पर फ्लैग लगे हैँ। इससे वर्षगांठ की रौनक जरूर दिख रही है। लेकिन सिविल जनता पूरी तरह से सिथिल पड़ी हुई है। वहीं सेना ने भी रेजीमेंटल मैदान में होने वाले कार्यक्रमों से सिविल जनता को इस बार अलग रखा है। एक नवंबर को परेड ग्राउंड में होने वाले रिक्रूटों के शपथ ग्रहण समारोह में जरूर नगर के कुछ खास लोगों को आमंत्रित किया गया है।
सिविल और सेना रही है एक दूसरे की पूरक
लैंसडौन सेना के लिए ही बसाया गया था। वक्त गुजरने के साथ सिविल आबादी भी काफी बढ़ी है। यहां सिविल लोग और सेना एक दूसरे की पूरक रही हैं। लेकिन इस बार गढ़वाल राइफल्स की 125वीं वर्षगांठ के कार्यक्रम को मनाने में सिविल जनता को दूर रखा गया है। व्यापारी संदीप कुमार कहते हैं कि बाजार में रौनक नहीं है। वर्षगांठ का जश्न मिलकर मनाया जाता तो अच्छा होता। इसमें सिविल और सेना के बीच दूरियां बढ़ सकती है। व्यापारी अशोक सिंह का कहना है कि पूर्व में जब भी बड़े आयोजन हुए हैं उसमें सिविल जनता को शामिल किया गया है। इस बार ऐसा नहीं करने से बाजार बेनूर दिख रहा है।
1887 में साथ-साथ आया था लश्कर
वर्ष 1887 में लैंसडौन में गढ़वालियों की पहली पलटन पहुंची थी। इस पल्टन की स्थापना अल्मोड़ा में की गई थी। आठ व्यापारी, एक हलवाई, दो सब्जी वाले, एक बूचड़ परिवार सबसे पहले आया था। शुरूआत के समय गांधी चौक से उपर वाले हिस्से में टैंट लगाकर सेना और अन्य लोग साथ रहते थे। बाद में बैरकेें बनी। जिसमें गढ़वाली कंपनी के लिए मैनवारिंग लाइन और गोरखा कंपनी के लिए क्वीन्स लाइन बैरकें बनी। सिविल लोगों ने अपने मकान बनाने शुरू कर दिए थे।
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