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राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव 2012 का रंगारंग आगाज

Pauri

Updated Tue, 30 Oct 2012 12:00 PM IST
श्रीनगर। राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव 2012 का सोमवार को रंगारंग आगाज हो गया। तस्वीर आर्ट ग्रुप की ओर से आयोजित इस महोत्सव के पहले दिन लोगों को बेहतरीन नाटक कोणार्क देखने को मिला। दूसरी तरफ, प्रसिद्ध चित्रकार जयकृष्ण पैन्यूली के चित्रों की प्रदर्शनी ने कलाकारों और दर्शकों को अपनी ओर खींचा। चार नवंबर तक इस महोत्सव में एक से बढ़कर एक बेहतरीन प्रस्तुतियों की उम्मीद की जा रही है।
हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विवि के स्वामी मंन्मथन प्रेक्षागृह में आयोजित महोत्सव का शुभारंभ स्थानीय विधायक गणेश गोदियाल ने दीप प्रज्वलित कर किया। इस मौके पर उन्होंने कहा कि भारतवर्ष की प्राचीन परंपरा में नाटक का बड़ा महत्व रहा है। उन्होंने राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के लिए सहायता दिए जाने की भी घोषणा की। बीते एक पखवाड़े से राष्ट्रीय नाट्य महोत्सव के आयोजन के वृहद प्रचार-प्रसार का असर प्रेक्षागृह में साफ दिखाई दिया। डेढ़ हजार से अधिक लोगों की पहले दिन मौजूदगी दर्ज हुई। इस मौके पर कुलपति सहित बड़ी संख्या में विवि के शिक्षक, कर्मचारी, विद्यार्थी व क्षेत्रीय रंगमंच प्रेमी मौजूद थे। नया थियेटर की दो दिनी प्रस्तुतियों का आयोजन तस्वीर आर्ट ग्रुप, स्पिक मैके तथा गढ़वाल विवि की मदद से किया जाएगा

नया थियेटर के ‘कोणार्क’ ने जमाया रंग
श्रीनगर। नया थियेटर ग्रुप की प्रस्तुति कोणार्क अपना रंग जमाने में कामयाब रहा। मध्य प्रदेश के इस ग्रुप से जुडे़ कलाकारों ने कोणार्क की शानदार प्रस्तुति दी और इसका जादू दर्शकों के सिर पर चढ़कर बोला। प्रेम से विरह तक के दृश्यों में कला व कलाकार की जरूरत तक सब कुछ नाटक में दिखाई दिया। किसी राज्य के शासन में राजा की दूरदर्शिता होने और न होने के अर्थों को भी नाटक ने साकार रूप दिया।
प्रसिद्ध लेखक जगदीश चंद्र माथुर द्वारा वर्ष 1950 में लिखित नाटक कोणार्क को मंच में दर्शाने के स्व.हबीब तनवीर के सपने को जब उनके ही द्वारा तैयार नाट्य संस्था नया थियेटर ने साकार किया, तो स्वामी मन्मथन प्रेक्षागृह तालियों से गूंज उठा। महान शिल्पी विशू तथा शवर कन्या झुमला (चंद्रलेखा) के प्रेम पक्ष से शुरू हुई कहानी प्रेमातिरेक के साथ आगे बढ़ती है। इसमें पार्श्व गायन कहानी को सुदृढ़ करने में महत्वपूर्ण साबित हुआ। उत्कल के राजा नृसिंहदेव द्वारा कोणार्क में सूर्य मंदिर बनाने के आदेश की याद आते ही चंद्रलेखा को छोड़ विशू सूर्यमंदिर बनाने लौट जाता है। यहां मुगल सेनाओं द्वारा उत्कल पर चढ़ाई करने की सूचना पर राजा नृसिंहदेव बंगाल की सीमा पर मुगलों से लड़ने के लिए निकलता है। इस बीच अवसरवादी चालुक्य को राजकाज की जिम्मेदारी मिलती है। जो 20 वर्षों से सूर्यमंदिर बनाने में जुटे शिल्पियों की पत्नियों को दासी बना देता है और उनके घरों को मिलने वाली मजदूरी को भी रोक देता है। यहां तक कि सात दिन के भीतर कोणार्क मंदिर पूर्ण न होने पर शिल्पियों के हाथ काट दिए जाने की भी घोषणा करता है। 20 वर्षों तक कोणार्क के सूर्य मंदिर में चोटी पर चुंबक से सूर्य चित्र अंकित करने का लक्ष्य पूरा करने में विशू नाकामयाब होता है। अंत में चित्रलेखा के गर्भ से पैदा विशू का पुत्र धर्मपद कोणार्क के सूर्यमंदिर को पूरा करने की युक्ति सुझाता है। अंत में चालुक्य के हाथ से कोणार्क मंदिर बचाने के लिए विशु स्वयं ही अपने 20 वर्षों की मेहनत को नेस्तनाबूद कर देता है।
नाटक का सबसे मजबूत पक्ष लोक संगीत रहा। छत्तीसगढ़ी गायन व वादन शैली ने नाटक में जान डाली, तो अनायास ही कहीं-कहीं संगीत की अधिकता ने नाटक की तारतम्यता को भी भंग किया। प्राचीन वाद्य यंत्र शहनाई, ढोल का प्रयोग नाटक में सटीक बैठा। नाटक विषयवस्तु के आधार पर देश के सबसे बड़े सूर्य मंदिर के निर्माण तथा उससे संबंधित राजनीतिक, आर्थिक, स्थापत्य कला तथा सामाजिक विषयों को बड़ी गंभीरता से उभारने में सफल रहा। मुख्य शिल्पी विशू तथा शिल्पी पुत्र धर्मपद की भूमिका में कलाकारों का अभिनय सराहनीय रहा। नाटक में राजा तथा राजा के दरबारियों की वेशभूषा नाटक के कथानक के अनुरूप नहीं दिखाई दी।

कोणार्क का यह था छठवां मंचन
श्रीनगर। कोणार्क नाटक का यह छठवां मंचन था, जिसका दर्शकों ने भरपूर आनंद उठाया। इससे पूर्व नवंबर 2011 से अब तक दिल्ली, भोपाल, उड़ीसा में कोणार्क का मंचन किया जा चुका है। मजबूत कहानी के साथ ही नाटक में शिल्प कला का चमोत्कर्ष भी देखने में आया। गोटीपुआ डांस, ओरिया कल्चर, पारंपरिक उड़िया ध्वनि भी नाटक का आकर्षण रही।


नाटक के मुख्य संवाद
- प्रेम से ही कला का जन्म होता है।
- कलाकार से कभी प्रेम अलग नहीं हुआ।
- मेरा कोई भी निर्माण तुम्हारे बिना अधूरा रहेगा।
- एक कलाकार के रूप में स्थान बनाने के लिए मुझे जाना ही होगा।
- कला तो सारे जीवन का प्रतिनिधित्व करती है।
- ठोकर खाकर ही धूल सिर पर चढ़ती है।
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