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‘राजा’ का खिताब बचाने को 11 बाघों गंवाई जान

Nainital

Updated Sun, 09 Dec 2012 05:30 AM IST
हल्द्वानी। कार्बेट पार्क में राजा का खिताब बचाने की कीमत बाघ को अपनी जान देकर चुकानी पड़ रही है। कार्बेट पार्क प्रबंधन के दावों और आंकड़ों की बात मानें तो पांच साल में दस से ज्यादा बाघ को दूसरे बाघों ने ही ढेर कर दिया। आपसी संघर्ष में मारे गये बाघों की संख्या प्राकृतिक मौत (उम्र पूरी) से ज्यादा है।
जंगल में बाघ की हुकूमत चलती है। हर बाघ का अपना क्षेत्र होता है, जहां वह किसी दूसरे की दखलंदाजी बर्दाश्त नहीं करता है। इलाके को बचाने या दूसरे का क्षेत्र हथियाने की कीमत बाघ को अपनी जान देकर चुकानी पड़ती है। कार्बेट पार्क प्रबंधन की माने तो हाल के सालों में मारे गये बाघों की एक बड़ी संख्या आपसी संघर्ष ही है। वन्यजीवों की मौत आदि बिंदुओं पर गोविंदपुरा के गुरविंदर चड्ढा ने कार्बेट पार्क प्रबंधन से सूचना अधिकार के तहत जानकारी मांगी थी।
दी गई सूचना बताती है कि 2007 से 2012 तक कार्बेट पार्क की सीमा में 28 बाघ(इसमें दो बाघों का शिकार भी शामिल) मारे गये। अगर शिकार के आंकड़ों को हटा दे तो 26 बाघ मारे गये हैं। इसमे सबसे ज्यादा 11 बाघ आपसी लड़ाई में मारे गये। तीन बाघ घायल होने और एक्सीडेंट में मारे गये। छह बाघ प्राकृतिक मौत(नेचुरल) से हुई। इसके अलावा कुछ बाघों की लाख सड़ीगली अवस्था में बरामद हुई।

पिछले साल सबसे ज्यादा मारे गये टाइगर
हल्द्वानी। पिछले साल सबसे ज्यादा टाइगर कार्बेट पार्क में मारे गये। इस साल आठ बाघ कार्बेट सीमा में ढेर हुए। इस साल शिकार भी कार्बेट पार्क क्षेत्र में पकड़े गये थे। इन घटनाओं से कार्बेट पार्क प्रबंधन की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल भी उठा था।

आंकड़ों की कलाबाजी
हल्द्वानी। कार्बेट पार्क प्रबंधन सूचना देने में भी खेल किया है। बाघों की संख्या में बारे में 2010 में बाघों ब्यौरा दिया गया है। इसमें कार्बेट लैंडस्केप शब्द का इस्तेमाल किया है, जिसके 1524 वर्ग किलोमीटर में 214 बाघों की संख्या बताई गई है। लैंड स्केप में कार्बेट पार्क सीमा के अलावा उससे सटे रामनगर, तराई पूर्वी, तराई पश्चिम वन, तराई केंद्रीय और हल्द्वानी डिविजन भी आता है। यह सीमा नेपाल तक है। जबकि बाघों की मौत के बारे में डाटा सीटीआर का दिया गया है।
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