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एसटीएच के एनआईसीयू के संचालन लापरवाही या सेटिंग!

Nainital

Updated Wed, 05 Dec 2012 05:30 AM IST
हल्द्वानी। सुशीला तिवारी अस्पताल में एनआईसीयू (नवजात शिशु गहन चिकित्सा कक्ष) के संचालन में भी खेल चल रहा है। लंबे समय से एनआईसीयू में 12 बेड एक्टिव ही नहीं हैं। बेड के अभाव में नवजात शिशु को रैफर कर दिया जाता है। यह सब खेल निजी अस्पतालों को फायदा पहुंचाने के मकसद से चल रहा है, लेकिन इस सबके बावजूद अस्पताल प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग बेखबर बना हुआ है।
एनआरएचएम योजना के अंतर्गत स्वास्थ्य विभाग ने दो साल पहले एनआईसीयू के लिए लाखों रुपये खर्च किए थे। इसमें बेडों की संख्या भी दस से बढ़ाकर 24 की गई। एनआईसीयू में वेंटिलेटर भी लगाए गए। एनआरएचएम के तहत स्वास्थ्य विभाग ने दो बाल रोग विशेषज्ञ, छह नर्सों और दो वार्ड आया का स्टाफ भी तैनात किया गया। इसके साथ मेडिकल कालेज के भी वरिष्ठ चिकित्सक इसमें तैनात हैं। कुछ समय तक तो एनआईसीयू बेहतर ढंग से संचालित हुआ, मगर समय बीतने के साथ इसमें भी कुछ लोगों का निजी स्वार्थ हावी हो गया। निजी अस्पतालों से मिलीभगत के चलते नवजात शिशु बाहर रैफर करने का खेल गुपचुप ढंग से चल रहा है।
अस्पताल के रिकार्ड के अनुसार पिछले एक सप्ताह से एनआईसीयू में 12 बेड पर ही नवजात शिशु भर्ती किए गए। बाकी 12 बेड डेड पड़े हैं। यह सिलसिला एक सप्ताह से ही नहीं बल्कि काफी समय से चल रहा है। एसटीएच में नवजात शिशु भर्ती न होने से परेशान मां बाप को मजबूरी में निजी अस्पतालों की शरण में जाना पड़ रहा है। सूत्रों की मानें तो किसी भी निजी अस्पताल में एनआईसीयू में नवजात शिशु को भर्ती कराने पर एक दिन का किराया पांच से सात हजार रुपये तक पड़ता है, जबकि एसटीएच में यह सुविधा पूरी तरह निशुल्क है। एनआईसीयू में 12 बेड क्यों बेकार पड़े हैं, इस बारे में कोई कुछ बताने को तैयार नहीं है। मेडिकल कालेज के प्राचार्य डा. आरसी पुरोहित से बात करने की कोशिश की गई तो उनका मोबाइल फोन नहीं उठा।
कोट
एसटीएच में एनआईसीयू में 12 बेड पर संचालित न किए जाने का मामला काफी गंभीर है। इसमें एनआरएचएम का काफी पैसा लगा है। इस मामले की जानकारी करने को सीएमओ को निर्देश दिए गए हैं।
डा. एससी कोरंगा, प्रभारी निदेशक स्वास्थ्य विभाग
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